आखिर इन पर कैसे कसे नकेल ?
देश पर भले ही युद्ध के बादल मडरा रहे हों पर कमल हासन जैसे कुछ लोग इस माहौल में भी “कश्मीर में जनमत संग्रह” की बात करके 'अभिव्यक्ति की आजादी’ का मखौल उड़ा रहे हैं। जिस अब्दुल रशीद गाजी को अमेरिका और नाटो देशों की सेना भी वर्षों तक तलाशती रही पर ढूंढकर खत्म नहीं कर पायी, उसे हमारी बहादुर सेना ने पुलवामा घटना के बाद चार दिन में ही घेरकर मार गिराया। हमे अपनी सेना की इस सटीक कार्रवाई पर गर्व होना चाहिए। नाटो देश तक हमारी सेना की इस बहादुरी की तारीफ कर रहे हैं। इसके विपरीत, अपने ही देश के कुछ नेता निहित स्वार्थ में अंधे होकर हल्ला मचा रहे हैं कि कश्मीरियों की सुरक्षा को खतरा पैदा हो गया है, कश्मीरियों को परेशान किया जा रहा है। दुनिया ने देखा कि जब सबसे खतरनाक इनकाउंटर चल रहा था, तब दस घंटे तक पत्थरबाजों को किस धैर्य के साथ सुरक्षा बलों ने लाउडस्पीकर पर चेतावनी देते हुए रोके रखा। जैस ए मोहम्मद जैसा वो दुनिया का खतरनाक आतंकी संगठन जिसपर अमेरिका ने भी प्रतिबंध लगा रखा हो, उसका नंबर दो का सरगना जहां हमारे मेजर सहित अन्य सैनिकों को शहीद कर रहा हो, ऐसी मुठभेड़ के मौके पर भी पत्थरबाज कश्मीरियों का एकत्र होना आखिर क्या दर्शाता है ? ऐसी खतरनाक मुठभेड़ के दौरान भी किसी पत्थरबाज को सैनिकों या सुरक्षाबलों द्बारा कोई नुकसान न पहुंचाना, दुनिया में इससे बड़ी भी क्या कोई संयम की मिशाल मिल सकती है ? इसके बावजूद महबूबा मुफ्ती और फारुख अब्दुल्ला द्बारा ये कहा जाना कि कश्मीरियों को परेशान किया जा रहा है, क्या ये राष्ट्रदोह की श्रेणी में नहीं आना चाहिए ? ममता बनर्जी सहित अन्य कुछ लोग भी सवाल उठा रहे हैं। यहां तक कहा जा रहा है कि सीमा पार से इतनी मात्रा में विस्फोटक आखिर आ कैसे सकता है ? ऐसे तमाम सवाल उठाकर क्या ये लोग दुश्मन देशों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर 'सुरक्षाकवच’ नहीं मुहैय्या करा रहे हैं ? जबकि जैस ए मोहम्मद का मुखिया खुद ही बार बार दावा कर चुका है कि पुलवामा हमला उसी के संगठन ने कराया और मारा गया खतरनाक आतंकी उसका दाहिना हाथ था। अमेरिका द्बारा प्रतिबंधित इस आतंकी संगठन में उसकी हैसियत नंबर दो की थी।

हमारी हालत देखिए जरा, हम अपने जवान भी खो रहे हैं और फिर बदनाम भी हो रहे हैं। इमरान खान तो सबूत मांग ही रहे हैं, कुछ भारतीय भी सबूत चाहते हैं। कुछ लोग तो सारी हदें पार करते हुए हमारी सेना को बदनाम करने में लगे हैं और ऐसा करने वाले हमारे अपने ही लोग हैं। वो जनता और देश के खैरख्वाह होने का दावा भी करते हैं। सर्जिकल स्ट्राइक का सबूत मांगकर ऐसे ही तब भी सेना को बदनाम किया गया था। जनता ने विधानसभा चुनावों के दौरान उसका दंड भी दिया। उसके बावजूद घटिया मानसिकता वाले लोग सबक लेने को तैयार नहीं हैं। ऐसा प्रोपोगेंडा तो हिटलर का भी नहीं रहा होगा। जश्न मना रहे गद्दारों पर कार्रवाई हुई तो इसे कश्मीरी असुरक्षा का रंग देने में लग गये। “मेरा घर खुला है कहीं असुरक्षा लगे तो मेरे यहां आ जाओ”, ऐसी दावत देने वाले आखिर ये कौन लोग हैं ? किसी खूंखार आतंकवादी को पनाह देने वाले आखिर ये कौन हैं ? क्या ये देश और समाज के दुश्मन नहीं हैं ? आखिर इस देश में एक सिस्टम है। चाहें जैसे हो, उनको तो हालात में आग लगानी है, जो काम पाकिस्तान वहां बैठकर कर रहा है, ये यहाीं से कर रहे हैं।

जैश ए मोहम्मद के जो खूंखार आतंकी गाज़ी और कामरान मुठभेड़ में मारे गए वो दोनो पुलवामा कांड के मास्टरमाइंड थे । अद्भुत और अविश्वसनीय साहस, सूझबूझ और संयम का परिचय देते हुए भारतीय सेना के कुछ वीर सपूतों ने अपनी कुर्बानी देकर वो काम कर दिया जिसपर पूरे विश्व के उन देशों को नाज़ है जो आतंक से पीड़ित हैं। इस तथ्य से दुनिया नावाकिफ नहीं है कि गाज़ी ने अमेरिकी सेना को भी काफी नुकसान पहुंचाया था। गाजी आईईडी एक्सपर्ट होने के साथ ही धर्म के नाम पर लोगों को फिदायीन बनने पर मजबूर भी करता था। वह अज़हर मसूद का दायां हाथ माना जाता था।आतंकवाद का इतना स्ट्रांग ईको सिस्टम देखकर सीआरपीएफ वाले भी हैरान हैं। सीआरपीएफ ने बाकायदा एडवाइजरी जारी कर इसके प्रति सावधान किया है। स्लीपर सेल अपना काम कर रहे हैं, पर कुछ घटिया लोग तो उनकी तरह ही खुलेआम हर बार आतंकियों की ढाल बनकर खड़े हो जाते हैं। बाद में अपने बचाव में इन्हीं के तर्क अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान देता है । कुतर्क ये कि पुलिस की पिटाई से आतंकी बन गए ? देश के तमाम जिम्मेदार लोग सवाल उठा रहे हैं कि फिर जिन्हें आप ने बड़े पद दिए , वो कितना देशभक्त बने रह पाए ? असुरक्षा का हल्ला मचाकर क्या उन लोगों ने भी देश को बदनाम करने की कोशिश नहीं की।

मीडिया के कुछ लोग भी आतंक के खिलाफ इस युद्ध में क्या गैरजिम्मेदराना भूमिका नहीं निभा रहे हैं ? पुलवामा में आतंकियों से मुठभेड़ चल रही थी, “मेजर सहित चार जवान शहीद हो चुके हैं”। अब क्या होने जा रहा है, की खबर भी डिजिटल मीडिया से प्रसारित और प्रचारित की जा रही थी। जबतक ऑपरेशन पूरा न हो जाए, तब तक कोई भी खबर वहां से बाहर क्यों निकल रही थी ? यह कैसी पत्रकारिता का नमूना है। क्या इसे संज्ञान लेने की जरूरत अब भी नहीं है ? ऐसी कवरेज आखिर क्या देशहित से बड़ी है ? जो कुछ भी ऐसे मौकों पर इन चैनलों में प्रसारित और प्रचारित होता है, क्या वह आतंकियों के आकाओं तक नहीं पहुंच रहा होता है? क्या वे उस समय आतंकियों को मुंबई हमले की तरह निर्देश नहीं दे रहे होंगे ? इस तरह की घातक कवरेज क्या बंद नहीं होनी चाहिए। प्रधानमंत्री, सेनाप्रमुख, गृहमंत्री और सूचनामंत्री को तत्काल प्रभाव से इन मुद्दों पर फैसला करने का समय क्या अभी भी नहीं आया है ? जो लोग सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत मांगते रहे, अब उसी मानसिकता वाले कह रहे हैं कि ''पुलवामा अटैक सर्जिकल स्ट्राइक का परिणाम है।'' क्या कहा जाए इन 'दो-गलों’ को ?