बहुत याद आएगी हिदी की नामवरी ठाट
क ऐसे दौर में जब किसी भी तरह के विमर्श और प्रतिरोध को नासमझ वाचालता और असभ्य प्रतिक्रियाओं का फौरी आखेट चुनौती दे रहा है, हिदी के आलोचकीय विवेक को लोकिप्रियता और स्वीकृति के सबसे ऊंचे आसन तक ले जाने वाले नामवर सिह का न होना महज एक खबर नहीं है। दरअसल, स्वाधीन भारत की हिदी चेतना को लोक और परंपरा के साझे के साथ समझने की चुनौती बहुत बड़ी रही है। इस बड़ी चुनौती का महत्व आज की तारीख में तब ज्यादा समझा जा सकता है, जब भाषा, कला और संस्कृति के पूरे विवेक को ही आवारा पूंजी की ताकत गैरजरूरी करार देने पर तुली है। इस चुनौती को स्वीकार करते हुए हिदी साहित्य के रचनात्मक विकास के साथ इस भाषा से जुड़ी संपूर्ण सांस्कृतिक निर्मिति को नामवर जी ने जो आलोचकीय धार दी, वह अद्बितीय है। 

नामवर सिह का जन्म 1927 में हुआ था। उनकी तरुणाई और देश की स्वाधीनता को अगर एक साथ देखें तो उस स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है,जब देश के साथ एक प्रखर युवा मन अपनी भाषा, संस्कृति और इतिहास की गोद में अपनी नई शिनाख्त की छटपटाहट से जूझ रहा होगा। गौरतलब है कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल 'हिदी साहित्य का इतिहास’ 1929 में लिख चुके थे। यानी देश की स्वाधीनता के साथ देश की सबसे प्रमुख भाषा के साहित्य और इतिहास का आलोचकीय निकष गढ़ा जा चुका था। यही नहीं 'लोकमंगल’ और 'परंपरा’ जैसे बीज शब्दों के साथ हिदी रचनात्मकता को देखने-परखने के उपकरण सामने आ चुके थे। आगे अगर कोई चुनौती थी, तो इन आलोचकीय उपकरणों के साथ हिदी की रचनात्मक अस्मिता को और गहरे पहचानने की, उसे नए संदर्भों और नए मुहावरों से लैस करने की।

बड़ी बात यह भी है कि रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्बिवेदी और रामविलास शर्मा के यहां हिदी साहित्य की आलोचना भक्तिकाल, छायावाद और राष्ट्रीय भावधारा तक आते-आते ठहर जाती है। जाहिर है कि आजादी के बाद के भारतीय समाज के विरोधाभासी यथार्थों के बीच रचे गए नए साहित्य को लेकर आलोचकीय समझ बनाने की चुनौती बड़ी थी। नामवर जी अपने जिन आलोचकीय प्रतिमानों के कारण लोकिप्रय रहे और हिदी आलोचना के शिखर आलोचक होने तक की स्वीकृति अपने जीते-जी पा गए, उन प्रतिमानों का एक सिरा अगर लोक और परंपरा के मस्तूलों से बंधा है, तो वहीं उसमें समाकालीन जीवन संदर्भों के बीच प्रगतिशील संवेदनात्मक तत्वों को पहचाने का आलोचकीय विवेक भी है। 

हिदी साहित्य के साथ पूरे हिदी समाज के लिए यह वाकई बड़े शोक की घड़ी है। हमारे दौर के महत्वपूर्ण कवियों में शामिल मंगलेश डबराल ने कहा भी कि यह हिदी के प्रतिमानों की विदाई का त्रासद समय है। सोलह महीनों के छोटे से अंतराल में कुंवर नारायण, केदारनाथ सिह, विष्णु खरे, कृष्णा सोबती और अब नामवर सिह के निधन से जो जगहें खाली हुई हैं, वे हमेशा खाली ही रहेंगी।

बनारस के एक छोटे से गांव जायतपुर में जन्मे नामवर सिह की चर्चा के साथ दो बातें हमेशा जुड़ी रहेंगी। एक तो उनकी भाषा से लेकर पूरे व्यक्तित्व को अपने गहन में लेनेवाला बनारसीपन और दूसरा अपने गुरु आचार्य हजारी प्रसाद द्बिवेदी से मिली आलोचकीय सीख को अमिट और अपराजेय बनाए रखने की उनकी जीवट जद्दोजहद। उनके व्यक्तित्व के ये दोनों रंग खासे ठेठ हैं। यहां तक कि नामवर जी खुद अपने जीवन संघर्षों के बीच भी इस ठेठ ठसक के साथ ही जीवट बने रहे।

आज पूरे देश में विश्वविद्यालयों में हिदी विभागों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। नामवर सिह को भुलाया इसलिए भी नहीं जा सकता, क्योंकि उन्होंने स्वाधीन भारत में हिदी आलोचना और विमर्श के केंद्र में विश्वविद्यालयों को लाने की दरकार को सबसे पहले समझा था। नए दौर में उच्च शिक्षा केंद्रों में हिदी को प्रतिष्ठा दिलाए बगैर हिदी ज्ञान परंपरा का विकास असंभव है, वे इस बात को समझते थे