बोलने में हम भारतीय ही आगे होते हैं

लखनऊ । बोलने में हम भारतीय ही आगे होते हैं, इसकी रियलिटी चेक कोई चाहे कर ले। बोलने का रिकार्ड चेक करना है, तो संयुक्त राष्ट्र जाइये। वहां हमारे नेताओं ने ही कीर्तिमान स्थापित किया है। पूर्व रक्षा मंत्री वी.के. कृष्ण मेनन को शायद आज की पीढ़ी नहीं जानती, मगर यूएन उन्हें सदा याद रखता है। 1957 में वी.के. कृष्ण मेनन कश्मीर पर सात घंटे बोले। आज तक संयुक्त राष्ट्र में सात घंटे निरंतर बोलने का रिकार्ड दुनिया का कोई नेता नहीं तोड़ पाया है। फिदेल कास्त्रो भी नहीं, जो 196० की संयुक्त राष्ट्र महासभा में चार घंटे 29 मिनट बोल पाये। अपने देश में पीएम मोदी ने अपना रिकार्ड बनाया, और खुद ही तोड़ा। उनके पूर्ववतीã अटल जी 27 मई 1996 को अपनी 13 दिन की सरकार गिरने के गम में डेढ़ घंटा बोल पाये थे। उस लंबी प्रधानमंत्रीय तकरीर को पीएम मोदी ने फरवरी 2०17 को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर दिये धन्यवाद प्रस्ताव के समय तोड़ा था। 1 घंटा 34 मिनट ! और पुन: 7 फरवरी 2०19 को ऐसे ही अवसर पर पीएम मोदी ने 1 घंटा 44 मिनट का रिकार्ड बनाया है।


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद के अपने कार्यकाल के आखिरी सत्र को संबोधित किया। उन्होंने इस सत्र में एक घंटे 4० मिनट के अपने भाषण में जिस ओजस्वी श्ौली को अपनाया उसके सामने विपक्ष शांत रहा। दरअसल प्रधानमंत्री मोदी की ओजस्वी भाषण की जो श्ौली है उसके सामने किसी भी राजनीतिक दल का कोई नेता नहीं टिका, शायद इसी का वह सबसे अधिक फायदा उठाते हैं। वरना पीएम मोदी ने 55 महीने का जो हिसाब दिया है, प्रतिपक्ष उसे क्रास चेक करके उन्हीं विषयों को जनता के बीच क्यों नहीं उठाता? क्या बेरोजगारी, नोटबंदी में लुट-पिट गये लोग, सबको स्वास्थ्य, बेघरों को घर, डबल डिजीट महंगाई, किसानों की बदहाली कोर इश्यू नहीं है? गुरूवार को संसद में इतिहास ही रच रहे थे। नाम लेने की आवश्यकता नहीं है। पूरा देश जानता है कि वाचन कला में सिद्धहस्त नरेंद्र मोदी के सिवाय कोई और नहीं हो सकता। एक घंटा 44 मिनट का भाषण। अमेरिका में प्रेसिडेंट एलबी जॉनसन लंबी स्पीच देने के वास्ते ख्याति प्राप्त थे। 1966 में उन्होंने 7० मिनट की स्पीच देने का रिकार्ड बनाया था। उस रिकार्ड को 2००० में राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने 89 मिनट का भाषण देकर तोड़ा था। 5 फरवरी 2०19 को प्रेसिडेंट ट्रंप उस रिकार्ड को तोड़ना चाहते थे। संसद के साझा सत्र (स्टेट ऑफ यूनियन ऐड्रेस) को संबोधित करते हुए प्रेसिडेंट ट्रंप सिर्फ 8० मिनट तक पहुंच पाये, और हांफते हुए बैठ गये। यानी, राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने 89 मिनट भाषण देने का जो रिकार्ड बनाया था, वह टूट नहीं पाया। मगर, भारत में बिल क्लिंटन के उस रिकार्ड को हमारे पीएम ने ध्वस्त कर दिया। 1०4 मिनट का नॉन स्टॉप भाषण।
प्रधानमंत्री मोदी से बस वाड्रा प्रकरण छूट गया? राबर्ट अंतरिम बेल की अवधि समाप्त हो जाने के बाद दो-एक दिन की हिरासत में ले लिये जाएं, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। सियासत के लिए हिरासत भी जरूरी है, ताकि यूपी में प्रियंका कार्ड को कमजोर किया जा सके। इसका अंदाजा शायद कांग्रेस अध्यक्ष को है। तभी शुक्रवार को बयान दिया कि वाड्रा, चिदंबरम की जांच कराइये, पर राफ़ेल पर जवाब दीजिए। ऐसा लगता है, कांग्रेसी अपनी कमजोरी को इस बार हथियार बना चुकी है। वाड्रा इस परिवार की सबसे बड़ी कमजोरी है। इसे परे झाड़कर प्रियंका गांधी पति को छोड़ने और रिसीव करने ईडी दफ्तर जा रही हैं, तो उसका संदेश नकारात्मक कम, सकारात्मक ज़्यादा जा रहा है। अटल जी के दामाद श्री का किस्सा किसी भक्त से पूछिये, बगलें झांकता है। 'तेरा दामाद, मेरे दामाद से सफ़ेद कैसे है?’ इस पर दोनों पार्टियों में डिबेट कराइये, भक्त भाग खड़े होंगे। 1996 से पहले पटना में रंजन किशोर भट्टाचार्य को ठीक से कोई जानता तक नहीं था। दिल्ली के श्रीराम कॉलेज से कामर्स ग्रेजुएट रंजन भट्टाचार्य, 1979 में श्रीनगर के ओबेराय होटल को ज्वाइन किया, कुछेक वर्षों में जनरल मैनेजर बन गये। 1987 में रंजन भट्टाचार्य मुलाजिम से आंटेप्रिन्यिोर बन चुका था। आर्किड रिसॉर्ट प्राइवेट लिमिटेड नामक कंपनी के बैनर तले मनाली में फोर स्टार होटल का निर्माण कराया। पांच साल बाद, उस प्रॉपर्टी को कांपीटेंट मोटर्स दिल्ली को रंजन भट्टाचार्य ने बेच दी। वाजपेयी जी 1996 में जब पहली बार प्रधानमंत्री बने, रंजन भट्टाचार्य को पीएमओ में ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी (ओएसडी) बनाकर ले आये। रंजन ने 1997 में टेलेंट मार्केटिग नामक कंपनी सेटअप की, जिसका काम अमेरिका स्थित होटल चेन कार्लसन रेजीडोर की दुनियाभर में रिजर्वेशन सेवा प्रदान करना था। इस ग्रुप का ग्लोबल टर्न ओवर 31.4 अरब डॉलर सालाना था। 19 मार्च 1998 को अटल जी दोबारा से पीएम बने। देखते-देखते रंजन भट्टाचार्य के सर्किल में हयात रिजेंसी के मालिक शिव जाटिया, रैडीसन के मालिक राजीव त्यागी, होटल व्यवसायी ललित सूरी, उद्योगपति नुस्ली वाडिया, देश के मीडिया मुगल, सत्ता के दलालशरीक हो गये। अटल शासन पार्ट टू के प्रारंभिक दौर में पीएमओ में ओएसडी शक्ति सिन्हा को वाशिगटन वर्ल्ड बैंक के वास्ते चलता किया गया, और उनकी जगह रंजन भट्टाचार्य की तैनाती हुई। पीएमओ में दो सत्ता केंद्र थे। एक प्रिंसिपल सेक्रेट्री ब्रजेश मिश्रा, और दूसरा रंजन भट्टाचार्य। इस पांच साल की अवधि में रंजन भट्टाचार्य ने कितनी प्रापर्टी बनाई, यह कभी आयकर, इन्फोर्समेंट डायरेक्टरेट के लिए शोध का विषय नहीं रहा है। मनमोहन सिह की सरकार भी इससे आंख मूंदती रही। शायद, उसकी वजह ये भी रही हो, तू मेरे दामाद पर चुप रहो, मैं तेरे दामाद पर।
विपक्ष अभी भी उस तरह हमलावर नहीं है। पचपन महीने में जो कुछ किया, उसे फील्ड में कोई जाकर क्रास चेक करे, उससे मोदी सरकार को फर्क पड़ता है। पहली बार प्रतिपक्ष का कोई नेता राफ़ेल जैसे विषय से इतना चिपका है। इन्हें लगा था, तीन तलाक का घमासान छेड़ेंगे, राफ़ेल राग गायब हो जाएगा। राजदार मिशेल का भौकाल खड़ा करेंगे, तो ये शांत बैठ जाएंगे। नेशनल हेरॉल्ड के बेल को बार-बार याद दिलायेंगे, खामोश हो जाएंगे। मगर, ये सब हो नहीं पा रहा है। पचपन महीने में देश की नौकरशाही कितनी विभाजित हुई है? इसकी पड़ताल आवश्यक है। नौकरशाही का बड़ा हिस्सा प्रतिपक्ष पर हमले का साधन बन चुका है, और उनमें से कुछ 'विभीषण' सत्ता पक्ष के गड़बड़झाले की फाइलें लीक कर रहे हैं। राफ़ेल की लीक हो रही फाइलों से पता चलता है कि पीएमओ, प्रतिरक्षा मंत्रालय के समानांतर पूरी डील को मॉनिटर कर रहा था। क्या राहुल गांधी राफ़ेल स्कैंडल को वोट बैंक में परिवर्तित कर पायेंगे? और देश में क्या इससे इतर भी मुद्दे हैं, जिनका इंतजार मतदाता कर रहा है?