केन्द्र और राज्यों के बजट से अन्नदाता के लिये ठोस नीति गायब क्यों ?

क्या केवल कर्जमाफी से ही सुलट जायेंगी किसानो की समस्याएं ?
ए, एस, ख़ाँन
लखनऊ। केन्द्र सरकार और विभिन्न राज्यों की सरकारों ने अपना बजट पेश कर दिया है । आगामी लोकसभा चुनावों की सुगबुगाहट के बीच इसे लालीपाप बजट भी कहा जा सकता है, जिसमें केवल लोकलुभावनी घोषणाऐं नजर आ रही हैं, कोई ठोस एवं स्पष्ट नीति नहीं । देश की एक बहुत बडी आबादी कृषी पर आश्रित है । तथा कृषी से जुड़े देश के अन्नदाताओं की स्थिती भी किसी से छिपी नही है । क्या अजीब विडंबना है कि पूरे देश का पेट भरने वाला अन्नदाता स्वंय फटेहाल एव भूखा रहने को विवश है । सरकारें एव राजनैतिक दल किसानों को लेकर घोषणाऐं तो अनेक करते आये हैं, किंतु वे केवल चुनावी स्टंट ही साबित होती रही हैं, वर्तमान में किसानों की कर्ज माफी को लेकर राजनिति चरम पर है, तथा अधिक से अधिक श्रेय लेने की होड,तथा किसानों को अपनी ओर आकृष्ट करने का मात्र उद्देश्य के सिवा कुछ नही ।
आखिर किसान कर्ज के बोझ तले क्यों दबा रहता है, इसपर मंथन क्यो नही किया जाता । तथा इसके लिये क्यो नहीं कोई ठोस नीति बनाई जाती ।
अस्सी के दशक में तत्कालीन सोवियंत संघ के सहयोग से देश में हरित क्रांति की शुरुआत हुई थी जोकि काफ़ी सफल साबित हुई थी ।
वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित आधुनिक कृषी की ओर देश अग्रसर हुआ था और किसानों की हालत में अभूतपूर्व सूधार भी देखनें को मिला था ।
किंतु समय के साथ सोवियतसंघ के विघटन तथा बाद की सरकारों की नीतियों ने हालात बिगाड़ दिये । अब ना तो देश में कृ्षी के आधुनिकरण को लेकर सरकारें गंभीर रहती हैं, और ना ही किसानों की उपज बढानें, उनकी फसलों का वाजिब दाम दिलाने, हेतु कोई ठोस नीति नजर आती है । किसानों को लेकर केवल कोरी राजनीति होती है, उनकी हालत को सुधारने के उपाय नहीं । जबकी होना ये चाहिये कि देश के अन्नदाता को प्रथम नागरिक घोषित किया जाना चाहिये, तथा वैज्ञानिकों तथा इंजिनियरों, को इस क्षेत्र में शोध हेतु प्रोत्साहन देना चाहिये, जिससे वे कृषी क्षेत्र में तिर्व गती से विकास का स्वरूप तैयार कर सकें । यदि मेरे हाथ में कुछ होता, तो मैैं चंद बडे विश्वविद्यालयों, एव शोध केंद्रों को सरकारी सरंक्षण के अंतर्गत लेता, तथा युवा वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, को इससे जोडता, देश हित मानव हित एव देश के तिर्व विकास में जो युवा छात्र योगदान देना चाहते हें, उनमें से प्रतिभा के आधार पर चयन कर उनको सरकारी सरंक्षण दिलाता, उनकी पढाई का खर्च से लेकर शोध हेतु सभी संयंत्र, एव उपकरण सुलभ कराता, जिससे वे ना केवल कृषी क्षेत्र अपितु प्रत्येक क्षेत्र का तिर्व आधुनिकरण का मार्ग प्रश्सत्र कर देश का तिर्व विकास सुनिश्चित कर सकें, ।
किसानों की उपज हेतु अधुनिक बाजार तैयार किये जाते तथा किसानों की उपज को सीधा खलिहानों, से खरीद का आधार तैयार करवाता ।
किसानो को बीज,खाद, से लेकर अधुनिक कृषी यंत्रों पर सब्सिडी दिलवाता, किसानों की न्यून्तन आय का खाका तैयार करवाता, तथा प्रत्येक किसान की स्थिती का आंकलन सुनिश्चित कराने हेतु "किसान डेटा बैंक" तैयार करवाता, जिससे किसानों की आर्थिक स्थिती सही तौर पर आंकी जा सके और आंकडों की बाजीगरी से बचाव किया जा सके । ये सब संभव है यदि पूरी ईमानदारी से प्रयास किये जायें, किंतु देश की वर्तमान राजनिती एैसा होने नही देना चाहती, कारण चंद धनाढ्य उधोगपतियों, के चंदे से चुनाव लडने वाले दल, केवल बडे उधोगपतियों के हितार्थ नीति बनाते हैं किसान,मजदूर,नौजवान, क्षात्र,हथकरघा उद्योग,कूटीर उद्योग, छोटे मधयम कल कारखाने, इनकी नीति के परिदृश्य से गायब रहते हैं, उनके लिये हैं, तो केवल कोरी घोषणाऐं, । एैसे में देश के विकास के दावे किस आधार पर किये जा रहे हैं, तथा देश को किस दिश में लेजानें का प्रयास हो रहा है, तथा देशकी राजनिती में धर्म को किस उद्देश्य से घसीटा जा रहा है ।
देश का वास्ताविक देश प्रेमी कब ये समझेगा । याद रखिये इतिहास के कुछ पन्ने लाल है तो कुछ सुनहरे भी, और अभी कुछ पन्ने कोरे भी हैं,
वर्तमान पीढी जो मार्डन टैक्नालीजी से सुसज्जित है, वो वर्तमान परिदृश्य को धता बताकर इन पन्नों को कैसे भरती है, आने वाली पीढियों को अपने होने का अहसास किन अक्षरों से कराती है और देश के नीति निर्धारण कर्ताओं का चयन किस आधार पर करती है । ये सब वर्तमान पीढी की बुद्धीमंता और विवेक पर निर्भर करेगा । जहाँ पूरा विश्व वैज्ञानिक पद्धति से तीव्र विकास की ओर अग्रसर है वहीं हम अभी भी देश की नीति मंदिर मस्जिद वालो के भ्रम जाल के आधार पर निरधारित करने वालों को सौंप रहे हैं ।