पत्थरबाजों को चेतावनी, माताओं को नसीहत
लेफ्टिनेंट जनरल केजेएस ढिल्लन ने 42 जवानों की शहादत के बाद सेना के कड़े रुख का संदेश दिया है। ढिल्लन ने पाक के घुसपैठी आतंकियों और पत्थरबाजों को दोटूक चेतावनी देते हुए कहा कि 'कश्मीर में जो बंदूक उठाएगा, वह मारा जाएगा।' उन्होंने माताओं को नसीहत दी कि 'मैं जम्मू-कश्मीर के अभिभावकों खासकर माताओं से विनम्र अपीत करता हूं कि वे गलत रास्ते पर चले गए लड़कों को आत्म समर्पण करने के लिए कहें। उन्हें मुख्य धारा में लौटने के लिए समझाइश दें।' ढिल्लन ने यह नसीहत इसलिए दी है, क्योंकि 2०17 में 2० वर्षीय गुमराह आतंकवादी अरशद माजिद खान ने आतंकवादी बनने के बाद माता-पिता के विलाप पर सेना के सामने आत्म-समर्पण कर दिया था। अरशद कॉलेज में फुटबॉल का अच्छा खिलाड़ी था। उसके आतंकवादी बनने की खबर मिलते ही मां-बाप जिस बेहाल स्थिति को प्राप्त हुए, उससे अरशद का हृदय पिघल गया और वह घर लौट आया। तब से वह अपना भविष्य संवारने में लगा है। यह चेतावनी इसलिए जरूरी थी, क्योंकि कश्मीर में युवा आतंकियों और पत्थरबाजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। 

कश्मीर के पुलवामा में जिस आतंकी हमले में हमारे 42 सैनिक शहीद हुए हैं, उसे अंजाम तक पहुंचाने का काम घाटी के ही 2० साल के युवा आदिल अहमद डार ने किया है। बारहवीं तक पढ़ा यह आतंकी एक आरा मशीन पर लकड़ी चीरने का काम करता था। पिछले साल 2०18 में यह जाकिर मूसा के संपर्क में आया और जैश-ए-मोहम्मद गिरोह में शामिल हो गया। यहां इसने कामरान गाजी से प्रशिक्षण लिया और 14 फरवरी को सीआरपीएफ के कफीले पर आत्मघाती हमला बोला। सेना ने इस हमले के मास्टरमांइड कामरान गाजी को 2 अन्य आतंकियों समेत मार गिराया गया हैं, लेकिन 

पिछले कुछ समय से आतंकी संगठनों ने कश्मीरी युवाओं की भर्ती तेज कर दी है। इसमें लड़कियां भी शामिल बताई जा रही हैं। जो नौजवान बंदूक दागने से डरते है, उन्हें पत्थरबाजी के लिए उकसाया जाता है। पिछले साल इन संगठनों से 191 युवाओं के जुड़ने की खुफिया जानकारी थी। 2०17 में इनकी संख्या 126 दर्ज की गई। ज्यादातर युवा जैश- ए-मोहम्मद, हिजबुल मुजाहिदीन और लश्कर-ए-ए-तैयबा जैसे संगठनों से जुड़े हैं। खुफिया जानकारी यह भी बताती है कि ये संगठन बच्चों और किशोरों को भी बरगलाने में कामयाब हो रहे हैं। इसकी पुष्टि संयुक्त राश्ट्र सुरक्षा परिषद की 2०18 में आई रिपोर्ट ने भी की है। यह रिपोर्ट 'बच्चे एवं सशस्त्र संघर्ष' के नाम से जारी हुई है। 

रिपोर्ट के मुताबिक ऐसे आतंकी संगठनों में शामिल किए जाने वाले बच्चे और किशोरों को आतंक का पाठ मदरसों में पढ़ाया गया। 2०17 में कश्मीर में हुए तीन आतंकी हमलों में बच्चों के शामिल होने के तथ्य की पुष्टि हुई थी। पुलवामा जिले में मुठभेड़ के दौरान 15 साल का एक नाबालिग मारा गया था। यह रिपोर्ट जनवरी-2०17 से दिसंबर तक की थी। मुबंई के ताज होटल पर हुए आतंकी हमले में भी पाक द्बारा प्रशिक्षित नाबालिग अजमल कसाब शामिल था। ये संगठन धर्म की गलत व्याख्या कर युवाओं की मानसिकता में जहर घोलने का काम करते हैं। पुलवामा हमले से पहले आदिल का विडियो संदेश जारी हुआ था, जिससे यह खुलासा होता है कि आतंकी धर्म का किस हद तक दुरुपयोग कर रहे हैं। वीडियो में दर्ज पैगाम है, 'अभी मैंने अपने हिस्से का कर्ज और फर्ज अदा किया है। अपनी जान का नजराना पेश करके उम्मत (इस्लामी जगत) का सिर बुलंद किया है। मुझ जैसे हजारों लोग तुम्हारी (भारत की) तबाही का सामान लिए अपनी मंजिल को पाने के लिए बेचैन हैं। हमारा जिहाद गजवा-ए-हिद की मुबारक कड़ी है, जिसे तोड़ता तुम गाय की पेशाब पीने वालों की वश की बात नहीं है। हम हर दिन पहले से अधिक ताकतवार हो रहे हैं। हमारी शहादत इस्लाम के लिए कुर्बानी है।' 

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में पहले ही उजागार किया जा चुका है कि पाकिस्तान में मौजूद आतंकी संगठन ऐसे वीडियो जारी कर रहे हैं, जिनमें किशोरों को आत्मघाती हमलों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। पाकिस्तान में सशस्त्र समूहों द्बारा बच्चों व किशोरों को भर्ती किए जाने और उनका आत्मघाती हमलों के लिए इस्तेमाल किए जाने के आरोपों को लेकर लगातार खबरें मिलती रही हैं। जनवरी-17 में तहरीक-ए-तालिबान ने एक विडियो जारी किया था, जिसमें लड़कियों सहित बच्चों को सिखाया जा रहा है कि आत्मघाती हमले किस तरह किए जाते हैं। इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि दुनियाभर में बाल अधिकारों के हनन के 21,००० मामले सामने आए हैं। पिछले साल दुनियाभर में हुए संघर्षों में 1० हजार से भी ज्यादा बच्चे मारे गए या विकलांगता का शिकार हुए। आठ हजार से ज्यादा बच्चों को आतंकियों, नक्सलियों और विद्रोहियों ने अपने संगठनों में शामिल किया। ये बच्चे युद्ध से प्रभावित सीरिया, अफगानिस्तान, यमन, फिलीपिस, नाईजीरिया, भारत और पाकिस्तान समेत 2० देशों के हैं। भारत के जम्मू-कश्मीर में युवाओं को आतंकवादी बनाने की मुहिम कश्मीर के अलगाववादी चला रहे हैं। 

दरअसल कश्मीरी युवक जिस तरह से आतंकी बनाए जा रहे हैं, यह पाकिस्तानी सेना और वहां पनाह लिए आतंकी संग्ठनों का नापाक मंसूबा है। पाक की अवाम में यह मंसूबा पल रहा है कि 'हंस के लिया पाकिस्तान, लड़के लेंगे हिदुस्तान।' इस मकसद की पूर्ति के लिए मुस्लिम कोैम के गरीब और लाचार बच्चे, किशोर और युवाओं को इस्लाम के बहाने आतंकवादी बनाने का काम मदरसों में किया जा रहा है। पाक सेना के वेश में यही आतंकी अंतरराष्ट्रीय नियंत्रण रेखा को पार कर भारत-पाक सीमा पर छद्म युद्ध लड़ रहे हैं। कारगिल युद्ध में भी इन छद्म बहरुपियों की मुख्य भूमिका थी। इस सच्चाई से पर्दा संयुक्त राष्ट्र ने तो अब उठाया है, कितु खुद पाक के पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल एवं पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई के सेवानिवृत्त अधिकारी रहे, शाहिद अजीज ने 'द नेशनल डेली अखबार' में पहले ही उठा दिया था। अजीज ने कहा था 'कारगिल की तरह हमने कोई सबक नहीं लिया है। हकीकत यह है कि हमारे गलत और जिद्दी कामों की कीमत हमारे बच्चे अपने खून से चुका रहे हैं।' कमोबेश आतंकवादी और अलगाववादियों की शह के चलते यही हश्र कश्मीर के युवा भोग रहे हैं। 

भटके युवाओं को राह पर लाने के के लिए केंद्र सरकार और सेना के साथ भाजपा ने भी चिता जताई थी। भाजपा के महासचिव और जम्मू-कश्मीर के प्रभारी राम माधव ने भटके युवाओं में मानसिक बदलाव की दृष्टि से पटनीटॉप में युवा विचारकों का एक सम्मेलन आयोजित किया था। इसे सरकारी कार्यक्रमों से इतर एक अनौपचारिक वैचारिक कोशिश माना गया था। बावजूद इसके, सबसे बड़ा संकट सीमा पार से अलगाववादियों को मिल रहा बेखौफ प्रोत्साहन है। दरअसल राजनीतिक प्रक्रिया और वैचारिक गोष्ठियों से यह हकीकत भी सामने लाने की जरूरत है कि जो अलगाव का नेतृत्व कर रहे हैं, उनमें से ज्यादातर के बीबी-बच्चे कश्मीर की सरजमीं पर रहते ही नहीं हैं। इनके दिल्ली में आलीशान घर हैं और इनके बच्चे देश के नामी स्कूलों में या तो पढ़ रहे हैं, या फिर विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों में नौकरी कर रहे हैं। 

केंद्र सरकार जब-जब उदारता बरतते हुए संघर्ष विराम का निर्णय लेती है, सेना को पत्थरबाजों का दंश झेलना पड़ा है। संघर्ष विराम का लाभ उठाते हुए आतंकियों ने राइफल मैन औरंगजैब और संपादक सुजात बुखारी की हत्या कर दीं थीं। नतीजतन द्र सरकार ने संघर्ष विराम तो खत्म किया ही, जम्मू-कश्मीर की पीडीपी सरकार से समर्थन भी वापस ले लिया। अब ये जानकारियां सामने आ रही हैं कि कभी आजादी की मांग का नारा बुलंद करने वाले दहशतगर्दों को अब आजादी नहीं बल्कि इस्लामिक स्टेट जम्मू-कश्मीर चाहिए। धार्मिक स्थलों और मदरसों की बदलती सूरतें इस तथ्य की गवाह हैं कि वहां हालत और गंभीर हो रहे हैं। पहले कश्मीर के भटके हुए युवा अपने लोगों को नहीं मारते थे और न ही पर्यटकों व पत्रकारों को हाथ लगाते थे। अब जो भी उनके रास्ते में बाधा बन रहा है, उसे वह निपटाने का काम कर रहे हैं। ऐसे में, लेफ्टिनेंट जनरल ढिल्लन का बयान वक्त की जरूरत है।