सफल राजनीतिक नेता थे, पांचवे राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद

फखरुद्दीन अली अहमद भारत के एक अत्यधिक सफल राजनीतिक नेता थे, जो भारत के राजनीतिक परिदृश्य पर एक स्थायी छाप छोड़ गए है। फखरुद्दीन अली अहमद बहुत लम्बे समय तक नेता रहे है, उन्होंने देश की राजनीती में भी मुख्य भूमिका निभाई थी. राष्ट्रपति बनने का इनका मुख्य उद्देश्य देश की सेवा करना था। महात्मा गाँधी व जवाहरलाल नेहरु जैसे नेता के साथ रहकर फखरुद्दीन अली अहमद ने राजनीती का गुर सिखा। फखरुद्दीन अहमद भारत के पांचवें राष्ट्रपति थे। फखरुद्दीन अहमद जन्म, परिवार एवं शिक्षा - पूरा नाम फखरुद्दीन अली अहमद, जन्म 13 मई 1905 3.जन्म स्थान पुरानी दिल्ली, भारत, पिता ज़ल्नुर अली अहमद, पत्नी बेगम आबिदा अहमद , बच्चे 3 , राजनैतिक पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस  मृत्यु 11 फ़रवरी 1977 दिल्ली।  
फखरुद्दीन अहमद जन्म 13 मई, 1905 को दिल्ली के हौज़ काज़ी एरिया में हुआ था। उनके पिता का नाम ज़ल्नुर अली अहमद था।  वे असम में एक आर्मी डॉक्टर थे। उनके दादा का नाम खलीलुद्दीन अहमद था, जो गोलाघाट शहर के निकट कचारीहाट के काज़ी थे।  फखरुद्दीन अली अहमद एक नामी और संपन्न मुस्लिम घराने से ताल्लुख रखते थे. उनका परिवार गैर रूढ़िवादी, धर्मनिरपेक्ष एवं देश भक्ति की भावना रखता था। फखरुद्दीन अहमद की माता जी लाहोर के नबाब की बेटी थी।  फखरुद्दीन अली अहमद (Fakhruddin Ali Ahmed ) की प्रारंभिक शिक्षा उत्तर-प्रदेश के गोंडा जिले के सरकारी हाई स्कूल में शुरू हुई थी।  जब वे सातवीं कक्षा में थे, तब उनके पिता का तबादला दिल्ली में हो गया। 1918 में वे दिल्ली आ गये. मैट्रिक की परीक्षा उन्होंने दिल्ली के सरकारी स्कूल से 1921 में उत्तीर्ण की. आगे की पढाई के लिए उन्होंने दिल्ली के प्रसिद्ध सेंट स्टीफन कॉलेज में दाखिला लिया। तत्पश्चात उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने भारत को छोड़ दिया और इंग्लैंड चले गए। जहां उन्होंने 1923 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के अंतर्गत सेंट कैथरीन कॉलेज में दाखिला लिया। 1927 में उन्होंने कानून की शिक्षा पूर्ण कर बैरिस्टर बन गए. 1928 में विधि की शिक्षा संपन्न की. उसके बाद 1928 में वे भारत लौट आए लाहौर हाईकोर्ट में वकालत शुरू कर दी। साथ ही अपने गृहप्रांत असम में कांग्रेस के आंदोलन से भी जुड़ गए। जल्द ही वह स्टेट काउंसिल के लिए चुने जाने लगे। 1937 में देश के कई राज्यों में कांग्रेस की सरकारें बनीं। असम में भी ऐसा हुआ, गोपीनाथ बारदोलाई के नेतृत्व में. इस सरकार के एक मंत्री फखरुद्दीन भी थे। 1942 के आंदोलन में वह जेल गए। साढ़े तीन बरस बाद रिहा हुए तो फिर कांग्रेस के काम को आगे बढ़ाने लगे। 1967 तक वह असम राज्य की राजनीति में सक्रिय रहे. फिर दिल्ली के हाईवे पर उनकी आमद हुई इंदिरा की पुकार पर। 1967 में इंदिरा गांधी कांग्रेस के ओल्ड गार्ड से वर्चस्व की लड़ाई लड़ रही थीं। एक तरफ थे के कामराज और निजलिंगप्पा जैसे धुरंधर नेता।  जो नेहरू के जमाने कांग्रेस का संगठन संभाल रहे थे। शास्त्री की मौत के बाद उन्होंने मोरार जी देसाई के बजाय इंदिरा का सपोर्ट किया था। इस उम्मीद में कि यह गूंगी गुड़िया उनके इशारों पर चलेगी। मगर नेहरू की बेटी का कुछ और ही इरादा था। 1967 के चुनाव में संगठन और सत्ता की कलह नतीजों पर दिखी।  इसी बरस इंदिरा ने नेहरू के वक्त से खानदान के वफादार रहे लोगों को अपने इर्द गिर्द जुटाना शुरू किया। फखरुद्दीन अली अहमद भी उनमें से एक थे। वह असम के बारपेटा सीट से चुनाव जीत लोकसभा पहुंचे. इंदिरा कैबिनेट में मंत्री बने। 


फिर राष्ट्रपति के चुनाव को लेकर कांग्रेस दो फाड़ हो गई। कम्युनिस्टों के समर्थन से इंदिरा ने सरकार बचा ली. नई पार्टी बनी, जिसका नाम रखा गया कांग्रेस आई (आई से इंदिरा अंग्रेजी में)। फखरुद्दीन अभी भी नेहरू की बेटी के साथ थे. 1972 के चुनाव में वह फिर पहले सांसद और फिर मंत्री बने। 1974 आते आते देश के सिर से 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध की खुमारी उतरने लगी थी. सबको याद था तो बस एक नारा।  इंदिरा का दिया गया. कि विपक्षी कहते हैं कि इंदिरा हटाओ।  और मैं कहती हूं कि गरीबी हटाओ। 


मगर गरीबी नहीं हटी थी। और लगातार सरकारी करप्शन की खबरें आ रही थीं। शुरुआत हुई गुजरात से. जहां छात्रों ने आंदोलन किया।  फिर आग पहुंची बिहार तक। और यहां से पूरे देश में।  इस विरोध को नैतिकता मुहैया कराई धुर गांधीवादी नेता और इंदिरा को इंदु बेटी कहने वाले जयप्रकाश नारायण ने. ऐसे वक्त में इंदिरा गांधी ने 1974 में फखरुद्दीन अली अहमद को देश का राष्ट्रपति बनाया। 


फिर साल आया 1975,  सरकार विरोधी आंदोलन तेजी पकड़ चुका था।  तभी इलाहाबाद हाई कोर्ट का एक फैसला आया।  जून के महीने में,  जस्टिस सिन्हा ने ये फैसला सुनाया।  याचिका थी विरोधी दल के एक नेता राजनारायण की।  शिकायत यह की इंदिरा गांधी ने लोकसभा के चुनाव में सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया।  फैसला इंदिरा के खिलाफ आया।  उन्होंने लोकसभा के सांसद के पद से हटने को कहा गया। साथ ही छह साल के लिए चुनाव के अयोग्य भी करार दिया गया।  और कोई दौर होता, तो इसके बाद सत्तारूढ़ दल की नेता कुछ वक्त के लिए ही सही सीट छोड़ देती।  या फिर सुप्रीम कोर्ट में अपील करती।  मगर यहां बात इंदिरा गांधी की हो रही थी।  जो शीर्ष पद पर रहने के दौरान लगातार विरोधियों के हमलों के चलते असुरक्षा की शिकार थीं।  और उन्हें सलाह देने वाले भी इस आग को भड़का रहे थे।  इसमें सबसे खास थे उनके अपने सपूत संजय गांधी।  जो पहले तो मारुति कार बनाने में खर्च हो रहे थे।  और फिर नेतागीरी में घुस गए, इसके अलावा पं. बंगाल के नेता सिदार्थ शंकर रे भी इंदिरा के अहम सलाहकारों में थे उन दिनों।  और इसके बाद आर्टिकल 352 के सेक्शन एक के तहत देश में इमरजेंसी लग गई। इसके लिए जरूरी कैबिनेट मीटिंग भी अगले दिन यानी 26 जून को हुई. सुबह के वक्त. इंदिरा गांधी के निवास 1 अकबर रोड पर. फैसले से ज्यादातर मंत्री भी सकते में थे।  मगर इंदिरा दरबार में सबको जरूरत भर बोलने की ही इजाजत थी। इसके बाद शुरू हुआ सरकारी नीतियों को जबरन लागू करने और सेंसरशिप का दौर। फखरुद्दीन अली अहमद को जल्द समझ आ गया कि उनके हाथों कांड हो गया है। कुछ ही वक्त बाद उनकी इंदिरा और उनके बेटे से ठनाठनी होने लगी।  विकीलीक्स के खुलासों के मुताबिक एक बार तो संजय गांधी ने सार्वजनिक रूप से राष्ट्रपति के लिए अशोभनीय टिप्पणी कीं। और इसकी वजह यह थी कि फखरुद्दीन अली अहमद ने संजय की पत्नी मेनका की मैगजीन सूर्या के लिए एक लेख लिखने से मना कर दिया था। अहमद ने संजय के इस बर्ताव पर नाराजगी जताई तो इंदिरा ने माफी मांगी।


फखरुद्दीन के पास नसबंदी को लेकर हुए अत्याचारों का भी लगातार हाल पहुंच रहा था। मगर वह अपनी संवैधानिक बंदिशों में बंधे थे। 11 फरवरी 1977 के दिन राष्ट्रपति भवन के दफ्तर में वह सुबह के वक्त गिर गए। अस्पताल ले जाए गए. पता चला कि उन्हें दिल के दो दौरे पड़े, जिसके चलते देहांत हो गया।  उस वक्त फखरुद्दीन की बेगम आबिदा ही उनके साथ थीं। दोनों बच्चे परवेज और समीना यूएस में थे।


मार्च में चुनाव हुए. इंदिरा की सत्ता से रुखसती हुई। जनता पार्टी सत्ता में आई. और तीन बरस बाद 1980 में इंदिरा फिर सत्ता में लौटीं। मगर लोकतंत्र के सफर में इमरजेंसी हमेशा के लिए एक मील का पत्थर बन गया। एक ऐसा वजनी पत्थर जिसने हमेशा खौफ और यकीन पैदा किया। डर कि सत्ता किस कदर निरंकुश हो सकती है। और भरोसा कि आखिर में जनता जनार्दन ही तय करती है कि किस हुक्मरान को कितना बर्दाश्त करना है।