चिकित्सा कर्म भी है तो सेवा भी: शिवानी बहन 

लखनऊ। चिकित्सा कर्म भी है तो सेवा भी। उपचार हाथ और मुख द्वारा किया जाता है, जिसका उद्देश्य होता है रोगी को शारीरिक रूप से स्वस्थ करना। पर सेवा का अर्थ है मरीज को न केवल शारीरिक रूप से स्वस्थ करना लेकिन उसे मानसिक और अथ्यात्क्मिक रूप से भी सशक्त और संतुष्ट करना । सेवा का निहितार्थ ही है देना और यह देने का कार्य तभी संभव है जब देने वाले की मानसिक स्थिति श्रेष्ठ हो ।यह बात ब्रह्माकुमारी शिवानी बहन ने डाक्टरों के लिए KGMU में आयोजित “ हीलिंग सेल्फ थ्रू सेल्फ रियलाईजेशन “ कार्यक्रम में कही।


चिकित्सकों को आइना दिखाते हुए शिवानी बहन ने कहा कि वे स्वयं से पूंछे कि वे कितनी सेवा करते हैं अथवा स्थूल धन का उपार्जन ही लक्ष्य है।उन्होंने कहा कि जब रोगी डाक्टर के पास आता है तो बीमार और दर्द में होता है, उसके परिवारजन भी परेशान रहते हैं. ऐसे में डाक्टर का इलाज़, व्यवहार और बोली रोगी को कितना सुकून देती है इसका ध्यान रखना चाहिए, ताकि वे संतुष्ट होकर जायें और मुख से दुआयें ही निकलें।


शिवानी बहन ने कहा कि प्रश्नचित्त रहने वाले कभी प्रसन्नचित्त नहीं हो सकते. डाक्टर भी चेक करें कि वे प्रश्नों से घिरे तो नहीं रहते ? उन्होंने सुझाव दिया कि चिकित्सक दिन भर में कम से कम एक घंटा स्वयं मनःस्थिति की चेकिंग करने के लिए निकालें और उसे सशक्त बनायें ताकि कार्य का तनाव, मरीजों का व्यवहार या ऐसी कोई भी परस्थिति उनको प्रभावित न कर सके, केवल तभी मरीज की वास्तविक एवं सम्पूर्ण चिकित्सा संभव है।आज के कार्यक्रम के मुख्य अतिथि रहे डा. रजनीश दुबे, प्रमुख सचिव, चिकित्सा. उन्होंने शिवानी बहन के कार्यक्रम को एक उत्सव बताते हुए संस्कृति के देश भारत में रोगों की बदती संख्या पर चिंता जताई. के. जी. एम. यू. के वीसी डा. प्रोफ़ेसर एम. एल. बी. भट्ट ने कहा कि आज के तानवपूर्ण माहौल में जहाँ जीवन असुक्षित हो चला है, में कम्पैशन और सेल्फ रियलाईजेशन की आवश्यकता है, जिसका मार्ग अध्यात्म से मिलता है। कार्यक्रम के संयोजक थे डा. विनोद जैन , डीन पैरा मेडिकल विभाग तथा सफल संचालन डा० भूपेन्दर सिंह ने किया।