खेती-बागवानी में खाद-उर्वरक  कृषि रक्षा रसायनों का उचित मात्रा में प्रयोग करें{ निदेशक
एक दिवसीय बागवानी उद्यमिता सेमिनार-2019 सम्पन्न

लखनऊ, 07 मार्च।   निदेशक, उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण डा. राघवेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा कि बागवानी के क्षेत्र में हो रहे विकास, नवीन किस्मों, उनकी उत्पादन तकनीक तथा इससे सम्बन्धित जानकरियों से जनसाधारण को अवगत कराना तथा शहरी जीवन की अतिव्यस्तता को देखते हुये पुष्पों की व्यावसायिक रुप से बागवानी करना समय की मांग है। उन्होंने कहा कि इसके लिये संरक्षित खेती में पुष्प उत्पादन अब व्यावसायिक उद्यम के रुप में स्थापित हो रहा है।

श्री सिंह आज उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग, उ.प्र. एवं केन्द्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान, रहमानखेडा़, लखनऊ के सहयोग से सेन्टर फाॅर एग्रीकल्चर एण्ड रुरल डेवलपमेन्ट, लखनऊ द्वारा उद्यान भवन प्रेक्षागृह, लखनऊ में बागवानी उद्यमिता पर आयोजित कार्यशाला में अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। उन्होंने कहा कि वर्तमान में कृषकों द्वारा खेती-बागवानी में खाद-उर्वरक एवं कृषि रक्षा रसायनों का प्रयोग अन्धा-धुन्ध करने से भूमि की संरचना बिगड़ती जा रही है, जो कि एक चिन्ता का विषय है। इस बात का ध्यान रखते हुये प्रदेश एवं केन्र्द्रीय सरकार जैविक खेती करने के प्रति कृषकों को निरन्तर जागरुक कर रही है। इससे जहां खेतों-बागों का स्वास्थ्य बेहतर होगा वहीं मानव जीवन भी सुरक्षित रह सकेगा।

    केन्द्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान, रहमानखेडा़, लखनऊ के निदेशक डा. शैलेन्द्र राजन ने कार्यशाला में आये हुये प्रतिभागी कृषकों को  बताया की बागवानी का कृषि क्षेत्र में अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है तथा प्रति इकाई क्षेत्र से अधिक आय, रोजगार तथा पोषण देने के कारण यह फसलें व्यावसायिक रुप ले रही हं। प्रदेश की अधिकांश छोटी जोत के किसानों के लिए बागवानी फसलंे अच्छा विकल्प प्रस्तुत करती हैं।

   इस कार्यशाला का उद्घाटन प्रो. हसीब अख्तर, पूर्व उपकुलाधिपति, नरेन्द्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, अयोध्या द्वारा किया गया। इस अवसर पर डा. अनीस अंसारी, अध्यक्ष, सेन्टर फाॅर एग्रीकल्चर एण्ड रुरल डेवलपमेन्ट, लखनऊ, मुख्य रुप से उपस्थित थे। इस कार्यशाला में  बागवानी तथा खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र से जुडे प्रदेश एवं केन्द्रीय संस्थानों के वैज्ञानिकगण की प्रतिभागिता के साथ-साथ प्रदेश के सभी मण्डलों के प्रगतिशील कृषकांे एवं उद्योगपतियों द्वारा भी प्रतिभागिता की गई।

   इस अवसर पर प्रो. हसीब अख्तर, पूर्व उपकुलाधिपति, ने कार्यशाला को सम्बोधित करते हुए कहा कि औद्यानिक फसलें प्रति इकाई क्षेत्र से अधिक पोषण, उत्पादन एवं आय देने में सक्षम हैं। इसी कारण देश में कुल कृषि फसलों केे अंतर्गत आच्छादित क्षेत्र में से मात्र 09 प्रतिशत क्षेत्र होते हुए भी कृषि जी.डी.पी. में औद्यानिक फसलों का लगभग 25 प्रतिशत का योगदान है। शहरों की बढ़ती जनसंख्या एवं प्रदूषण से पैदा हुए पर्यावरण असंतुलन के कारण मनुष्य के लिए आज यह अनिवार्य हो गया है कि उसका बागवानी फल-वृक्षों, शाकभाजी, फूलों एवं अलंकारिक उद्यानों से कुछ न कुछ सम्बन्ध अवश्य बना रहे। संतुलित आहार के लिए प्रत्येक व्यक्ति को कम से कम 85-90 ग्राम फल तथा 250 से 350 ग्राम सब्जी प्रतिदिन उपयोग में लाना चाहिए। विभाग का प्रयास है कि प्रदेश की जनता के स्वस्थ्य जीवन यापन हेतु औद्यानिक फसलों की न केवल आवश्यक आपूर्ति हो अपितु इनके विपणन एवं निर्यात से प्रदेश को तथा कृषकों को पर्याप्त आय प्राप्त हो सके।

   कार्यशाला में विशेष रुप से फूलों की बागवानी में सूक्ष्म सिंचाई पद्धति के अंतर्गत टपक सिंचाई के बारे में डा. वी. के. सिंह, प्रधान वैज्ञानिक, केन्द्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान, रहमानखेडा़, लखनऊ, ए.के. मिश्रा, राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड, डा. एन.एल.एम. ़ि़त्रपाठी, नोडल अधिकारी (सूक्ष्म सिंचाई) उद्यान निदेशालय, लखनऊ तथा  मोइनुद्दीन, पुष्प उत्पादक ने विस्तार से जानकारी दी।

   कार्यशाला में आये कृषकों को जैविक खेती के तकनीकी पहलुओं की जानकारी, वी.के. सचान, उप निदेशक कृषि, डा. चन्द्र शेखर गुप्ता, राष्ट्रीय वनस्पति स्वास्थ्य प्रबन्ध संस्थान, डा. राम अवध राम, प्रधान वैज्ञानिक, केन्द्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान, रहमानखेडा़, लखनऊ, डा. शशांक शेखर सिंह, नरेन्द्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय तथा श्री विनोद चैहान, उद्यमी, ने दी। 

   उच्च गुणवत्तायुक्त शाकभाजी एवं फल उत्पादन की नवीनतम जानकारी से डा. अतुल कुमार सिंह, संयुक्त निदेशक (उद्यान), उद्यान निदेशालय लखनऊ, डा. एस.के. चैहान, नोडल अधिकारी (खाद्य प्रसंस्करण),  अनामिका सिन्हा, इन्दिरा गाॅधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, तथा केन्द्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान, रहमानखेडा़, लखनऊ, के प्रधान वैज्ञानिक डा. एस.आर. सिंह, तथा डा. अशोक कुमार ने कृषकों को अवगत कराया।