पाकिस्तानी  अपनी जर्जर होती अर्थव्यवस्था के चलते युद्ध से बचना चाहता है

मुस्लिम देशों के इस संगठन ने आज तक भारत को हमेशा नजरअंदाज किया था


ह चुनावी मौसम है और इस मौसम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीति ने पाकिस्तान से ज्यादा विपक्ष पर सर्जिकल स्ट्राइक कर दी है। अपनी विदेश नीति और कूटनीति से प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान के प्रति जो रवैया अपनाया और पूरी दुनिया के सामने भारत के पक्ष में माहौल बनाया वह काबिले तारीफ है। इसके पीछे की रणनीति कुछ भी रही हो लेकिन जिस तरह से महज 5० घंटों के भीतर ही पहली बार कोई भारतीय पाकिस्तान की सरहद और उसके कब्जे से बाहर आ गया। उससे उनके पहले के उठाये गये सभी गैर लोकप्रिय फैसले मानस पटल से पीछे हट गये। सिर्फ अभिनंदन के मामले में ही क्यों, वहां पर सर्जिकल स्ट्राइक, हवाई हमला, सेना को खुली छूट देना भी कम लोकप्रिय नहीं रहा। यह पहला मौका है जब भारत को ओआईसी की बैठक में विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया है। ओआईसी दुनिया के 56 इस्लामी देशों का सबसे बड़ा संगठन है। दुनिया की तीसरी बड़ी मुस्लिम आबादी भारत में रहती है, इसके बावजूद मुस्लिम देशों के इस संगठन ने आज तक भारत को हमेशा नजरअंदाज किया था। भारत को इस संगठन की सदस्यता देना तो दूर, पर्यवेक्षक का दर्ज़ा भी नहीं दिया गया। जबकि पर्यवेक्षक के तौर पर रूस, थाईलैंड और कई छोटे-मोटे अफ्रीकी देशों को हमेशा बुलाया जाता है। यह भी पहला मौका है जब भारत को आमंत्रित ही नहीं किया गया बल्कि भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को मुख्य अतिथि का दर्जा दिया गया। वह भी तब जब पाकिस्तान इस आमंत्रण का खुला विरोध करता रहा। दिलचस्प तो यह रहा कि इस्लामी देशों की बैठक में पहली बार पाकिस्तान की ओर से कोई प्रतिनिधि नहीं पहुंचा। पाकिस्तान की नाराजगी के चलते वहां कुर्सी खाली रही। पाकिस्तान का न शामिल होना भी भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत कही जायेगी क्योंकि आज तक तो पाकिस्तान अपने आप को इस्लामिक देशों का सरगना समझता रहा है।
दरअसल, दुनिया के इस्लामी देश पुलवामा में हुए आतंकवादी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध जैसे हालात बनने से रोकना चाहते हैं। पाकिस्तानी नेतृत्व चाहे जो कहता रहे लेकिन हकीकत यह है कि वह भी अपनी जर्जर होती अर्थव्यवस्था के चलते युद्ध से बचना चाहता है। इसीलिए उसने इस बार आईसीओ के सम्मेलन में भारत को बुलाने की पहल का विरोध नहीं किया था, हालांकि अब उसके कुछ सांसद उस बैठक का बहिष्कार करने की मांग कर रहे हैं। 1969 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कृषि मंत्री फखरुद्दीन अली अहमद को इस संगठन के सालाना सम्मेलन में शिरकत करने के लिए मोरक्को भेजा था, लेकिन पाकिस्तान के फौजी तानाशाह याह्या खान की तिकड़मों के चलते निमंत्रण पाने के बावजूद फखरुद्दीन अली अहमद उस सम्मेलन में भाग नहीं ले सके थे। उसके बाद पिछले 5० सालों के दौरान जब भी इस संगठन का सम्मेलन हुआ, उसमें कश्मीर को लेकर भारत की भर्त्सना हुई। इस बार भारत को जो निमंत्रण मिला है, उसके लिए माना जा रहा है कि वह सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात की पहल पर मिला है। वैसे पिछले साल बांग्लादेश की शेख हसीना सरकार ने भारत को पर्यवेक्षक का दर्ज़ा देने का प्रस्ताव किया था। आईसीओ के सम्मेलन में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को पाकिस्तानी विश्लेषकों के प्रचार का करारा जवाब दिया। उन्होंने इस्लामिक देशों के सामने यह कहकर कि अल्लाह के 99 नामों में से किसी का भी नाम हिंसा नहीं, पाकिस्तान के मुंह पर करारा तमाचा मारा है। यही नहीं, सऊदी शाहजादे ने भारत को आश्वस्त किया है कि सऊदी अरब के संसाधनों का भारत के खिलाफ इस्तेमाल नहीं होगा और साथ ही सऊदी अरब में पनपने वाली जेहादी विचारधारा और वहां सक्रिय भारत-विरोधी तत्वों के खिलाफ सऊदी हुकूमत कार्रवाई करेगी।
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीति और विदेश नीति का आज पूरी दुनिया ने लोहा माना है। यह भारत सरकार के पक्ष में बनाया गया अंतर्राष्ट्रीय दबाव ही था जिसके चलते पाकिस्तान को दो दिनों के भीतर ही फाइटर पायलट अभिनंदन को लौटाने को मजबूर होना पड़ा। मोदी सरकार की इस नीति का साफ असर आगामी लोकसभा चुनाव में देखने को मिलेगा। विपक्षी महागठबंधन और प्रियंका गांधी के कांग्रेस में शामिल होने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में जिस तरह माहौल बनता दिख रहा है, वह पार्टी के रणनीतिकारों को जरूर खुश रहने का अवसर दे रहा होगा।