राजनीति ने ही जम्मू काश्मीर में राजनेताओं को आतंकियों का समर्थक बना रखा है

सत्ता के लिए तार तार होती लोकतांत्रिक राजनैतिक मर्यादाओं से पैदा समस्या और सैनिक एअर सर्जिकल स्ट्राइक पर उठते सवाल

राजनीति में दुश्मनी और दोस्ती दोनों लोकतांत्रिक मर्यादाओं के दायरे में राष्ट्रीय हितो को सर्वोच्च रखकर होनी चाहिए , लेकिन इधर राजनीति लोकतांत्रिक वसूलों की पटरी से उतरकर बेपटरी होकर मात्र सत्ता प्राप्ति तक केन्द्रित होकर रह गयी है। राजनीति में चुनाव में मतदाताओं को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप तो लगाये जाते है लेकिन देशहित को दाँव पर नहीं लगाया जा सकता है।राजनीति ने ही जम्मू काश्मीर में राजनेताओं को आतंकियों का समर्थक बना रखा है और राजनीति ही है जिसके चलते आज वह काश्मीर से धारा 370 हटाने का विरोध और राष्ट्र विरोधी देशद्रोही ताकतों का विरोध नही कर पा रहे।राजनीति ही है जिसके चलते आज सर्जिकल स्ट्राइक आगामी लोकसभा चुनाव में अहम मुद्दा बन रही है। राजनीति ही है कि एक तरफ नापाक पाकिस्तान सीमा पर मोर्टार छोड़कर हमारे देश के लोगों को शिकार बना रहा है और आतंकियों के जरिये हमसे अघोषित युद्ध कर रहा है और हम अपने बहादुर जाबाँज सैनिक विंग कमांडर की तत्काल वापसी का जश्न मनाकर चुनावी श्रीगणेश करने करने जा रहे हैं।राजनीति ही है जिसके चलते आजकल हमारे बहादुर सैनिकों द्वारा की गई एअर सर्जिकल स्ट्राइक एवं उससे हुयी मौतें राजनैतिक मंच के मुद्दे बन गई हैं।राजनीति ही है कि अभी पिछले दिनों बंगाल की मुख्यमंत्री ममता दीदी को भ्रषटाचार के आरोपियों को संलक्षण ही नही बल्कि सीबीआई कार्यवाही के साथ हाथापाई मारपीट एवं विपक्षी दलों के साथ धरने पर बैठना और प्रधानमंत्री से सर्जिकल कार्यवाही के सबूत मांगना पड़ रहा हैं।यह सही है कि सर्जिकल कार्यवाही के बाद देश में राष्ट्रभक्ति की ऐसी लहर दौड़ी है कि आगामी लोकसभा चुनाव के सभी प्रस्तावित मुद्दे पुलवामा हमले और बदले में की गई कार्यवाही के बाद पूरे देश में बदल गये है। यह भी सही है कि सत्तादल इसका पूरा फायदा उठाना चाहता है जबकि इस नये मुद्दे का जबाब विपक्ष को तलाशना पड़ रहा है।आजकल सर्जिकल स्ट्राइक के दौरान हुयी मौते की संख्या को लेकर गर्मागर्म राजनैतिक बहसें शुरू हो गई है और पूरी सैनिक कार्यवाही को संदेहों के घेरे में लिया जाने लगा है।यह हमारी राजनीति ही है जिसके चलते सैनिक कार्यवाही में हुयी मौतों की संख्या बिना प्रमाणिक जानकारी के घोषित की जा रही है।हमारी सेना ने स्पष्ट कहा कि हम दिये गये लक्ष्य को पूरा करने गये थे लाशें गिनने नहीं गये थे।हमारी राजनीति ही है जिसके चलते सैनिक कार्यवाही के दौवात मरने वालों की संख्या कोई चार सौ तो कोई साढ़े चार सौ तो कोई तीन और ढाई सौ बता रहा है।राजनीति ही है जिसके चलते अखंड भारत के खंड होकर पाकिस्तान बन गया और राजनीति है जिसके चलते पाकिस्तान तमाम नापाक हरकतों के बावजूद दुनिया के नक्शे पर जिंदा है।राजनीति का ही परिणाम है कि हमारे यहाँ नक्सलवाद जातिवाद एवं भ्रष्टाचार फलफूल रहा है।राजनीति का ही फल है कि आजादी के बाद से अबतक जातिगत आरक्षण की व्यवस्था जारी है और उसे आर्थिक स्वरूप नहीं मिल सका है।