राममंदिर एवं बाबरी मस्जिद का मुद्दा एक बार फिर सुर्खियों में

देश की कौमी एकता अखंडता के घातक राममंदिर बाबरी मस्जिद मुद्दा और सुप्रीम कोर्ट के ऐतहासिक फैसले पर 
गामी लोकसभा चुनाव के पहले देश की सर्वोच्च न्यायालय के एक महत्वपूर्ण फैसले के बाद आजादी के बाद से चल रहे राममंदिर एवं बाबरी मस्जिद का मुद्दा एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है।सभी जानते हैं कि यह मुद्दा शुरू से न्याय के तराजू पर तुले फैसले के लिए अदालत में लटका हुआ है।जिला सत्र न्यायालय से लेकर उच्च न्यायालय तक इस अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दे पर अपना फैसला तमाम तकनीकी जांचों से मिले साक्ष्यों के आधार पर अपना फैसला सुना चुके हैं।उच्च न्यायालय के फैसले से पहले इस मुद्दे को लेकर आपसी सुलह समझौता कराने की कोशिशें हो चुकी हैं लेकिन सफलता आजतक नहीं मिल सकी है।सभी जानते है कि मामला अदालत के सामने तभी जाता है जब आपसी सुलह समझौता नहीं हो पाता है और साक्ष्य के आधार पर फैसले की जरूरत होती है।राममंदिर एवं मस्जिद का मामला आस्था के साथ साथ तथ्यों पर आधरित है क्योंकि उच्च न्यायालय पुरातत्व विभाग से इसकी ऐतहासिक पृष्ठभूमि की तकनीकी जांच सुनवाई के दौरान करा चुका है। इसके बावजूद उसके फैसले के खिलाफ दोनो पक्ष सुप्रीम कोर्ट में अपील कर चुके हैं, जिसकी सुनवाई कल थी।सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय खंड ने कल इस मामले में अपनी तरफ से कोई फैसला न सुनाकर इसे आस्था एवं धार्मिक भावनाओं से जुड़ा बताते हुए मध्यस्थतों के माध्यम से सुलह समझौते के आधार पर मामले को तय करने की सलह दी है साथ दोनों पक्षों से मध्यस्थों का नाम तय करके देने के निर्देश दिये हैं।ऐन चुनाव के समय सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से मुस्लिम पक्षकार तो सहमत हैं लेकिन सभी हिन्दू पक्षकार एकमत नही हैं और वह अदालत से साक्ष्यों सबूतों के आधार पर न्याय के तराजू पर तौल कर फैसला सुनाने के पक्षधर हैं।


यह सर्वविदित है कि बाबरी मस्जिद को अयोध्या में मंदिर को तोड़कर बनवा गया था लेकिन यह भी सही है कि उस बाबरी मस्जिद से मुसलमानों के एक वर्ग की आस्था जुड़ी है और वह उसे राममंदिर से कम महत्व नहीं देते हैं।राममंदिर एवं बाबरी मस्जिद के नाम पर दोनों पक्षों के कुछ लोगों ने कमाई की दूकानें खोल रखी हैं और वह अपनी कमाई का जरिये को बंद होने नहीं देना चाहते हैं।यही कारण रहा कि साठ साल बाद भी इस मामले का समझौता नहीं हो सका है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुनाया गया फैसला अपने आप में ऐतहासिक एवं अभूतपूर्व सराहनीय स्वागत योग्य है।यह भी सही है कि उच्चतम न्यायालय से ऐसे फैसले की उम्मीद किसी को भी नहीं थी।देश की आला अदालत की इच्छानुसार अगर दोनों पक्ष आपसी सुलह समझौता कर लेते है तो इससे बेहतर कुछ भी नहीं होगा और देश को कौमी एकता को मजबूती मिलेगी।सभी जानते हैं कि सुलह समझौते नरम गरम होते हैं और दोनों पक्षों को थोड़ा थोड़ा बर्दाश्त करना पड़ता है।चूंकि यह मामला राष्ट्र की कौमी एकता अखंडता से जुड़ा है इसलिए दोनों पक्षों का फर्ज बनता है कि राष्ट्रहित में इस मामले को हमेशा हमेशा के लिए समाप्त कर दें।हिन्दू एवं मुस्लिम दोनों पक्षों के अलग अलग संगठनों के साथ मूल पक्षकार भी इस विवाद से जुड़े हुए हैं यही कारण है कि सुलह समझौता में सभी एकमत नहीं हो पाते हैं लेकिन खुशी इस बात की है कि इस बार दोनों पक्ष सहमत हैं।देखना है कि देश की सबसे बड़ी अदालत की भावनाओं के अनुरूप इस विवाद का समझौता दोनों पक्षों में हो पाता है या नही? अगर दोनों के मध्य सुलह समझौता नहीं हो पाता है तो सर्वोच्च अदालत को देश हित में साक्ष्यो सबूतों के आधार पर अपना ऐतिहासिक निर्णय सुना देना चाहिए ताकि इस विवाद की आड़ में राष्ट्रविरोधी ताकतों को पैर फैलाने का अवसर न मिल सके।अदालत के इस फैसले से विवाद में आपसी सुलह समझौता हो या न हो लेकिन इस फैसले से यह मुद्दा एकबार फिर चुनावी माहौल में चर्चा का विषय बन गया है