दिग्विजय की जीत के लिए स्वामी  रोज 5 किलो लाल मिर्ची का करेंगे हवन

 


भोपाल सीट से कांग्रेस उम्मीदवार दिग्विजय सिंह की जीत के लिए महामंडलेश्वर स्वामी वैराग्यानंद भी मैदान में उतर आए हैं। दिग्विजय की जीत के लिए स्वामी 5 मई से रोज 5 किलो लाल मिर्ची का हवन करेंगे। बावजूद यदि दिग्गी नहीं जीते तो स्वामी ने जल समाधि लेने का दावा किया है।

कंप्यूटर बाबा के बाद वैराग्यानंद ऐसे दूसरे 'संत' हैं, जो कांग्रेस की जीत के लिए टोने-टोटकों का सहारा ले रहे हैं। भोपाल से भाजपा प्रत्याशी साध्वी प्रज्ञा मैदान में हैं। उनके समर्थन में उमा भारती ने भी चुनाव प्रचार के लिए कमर कस ली है। हैरानी इस बात पर है कि ये साध्वियां तो जीत के लिए किसी यज्ञ-हवन, तंत्र-मंत्र या टोने-टोटकों का सहारा नहीं ले रही हैं, किंतु पूर्व मुख्यमंत्री का इस तरह के अनुष्ठानों का सहारा लेना समझ से परे है।
दिग्विजय सिंह धार्मिक व्यक्ति होने के साथ पूजा-पाठ और तांत्रिक क्रियाओं में भरोसा रखने वाले व्यक्ति हैं। पाखंड और आडंबर से वे लगभग दूर रहते हैं। मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले उनकी की गई नर्मदा परिक्रमा धार्मिक यात्रा के साथ-साथ सांस्कृतिक यात्रा भी थी। हालांकि इस यात्रा में राजनीतिक हितों को साधना भी अंतर्निहित था। मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली जीत में यह यात्रा भी अहम् रही है। लेकिन इस पूरी यात्रा में सिंह ने कहीं भी टोने-टोटकों का सहारा नहीं लिया। ऐसे में मिर्ची यज्ञ उनकी जीत में कितनी अहम् भूमिका निभाएगा, यह रहस्य अंधविश्वास के गर्त में ही छिपा रहेगा। बताने की जरूरत नहीं कि उन्हें जीत मतदाताओं से सतत संपर्क और मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने जो जनहितकारी काम किए हैं, उनसे ही मिलेगी।
विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों ही अंधविश्वासी नजर आए थे। भाजपा जहां अपने भोपाल स्थित प्रदेश मुख्यालय में वास्तुदोष दूर करने के पाखंड में लगी रही, वहीं कांग्रेस भाजपा की बुरी नजर से बचने के लिए अपने कर्यालय के दरवाजों पर नींबू-मिर्ची के टोटके लटका रही थी। जाहिर है, हमारे नेताओं में अंधविश्वास की कमजोरी व्यापक है। इनका दायित्व बनता है कि ये धार्मिक पाखंड और आडंबर दूर करते हुए जनता में वैज्ञानिक सोच विकसित करने के उपाय करें।
अक्सर हमारे देश में ग्रामीण, अशिक्षित और गरीब को टोने-टोटकों का उपाय करने पर अंधविश्वासी ठहरा दिया जाता है। अंधविश्वास के पाखंड से उबारने की दृष्टि से चलाए जाने वाले अभियान भी इन्हीं लोगों तक सीमित रहते हैं। आर्थिक रुप से कमजोर और निरक्षर व्यक्ति के टोने-टोटकों को इस लिहाज से नजरअंदाज किया जा सकता है कि लाचार के कष्ट से छुटकारे का आसान उपाय दैवीय शक्ति से प्रार्थना ही हो सकती है। लेकिन विडम्बना यह है कि जिन नेताओं पर जनता को जागरूक और जनहितैषी नीतियों के जरिए समृद्धशाली बनाने की जिम्मेवारी है, वे खुद अंधविश्वास से जकड़े हुए हैं। दरअसल वास्तु, टोने-टोटके जैसे प्रतीक अशक्त और अपंग मनुष्य की बैशाखी हैं। जब इंसान सत्य और ईश्वर की खोज करते-करते थक जाता है और किसी परिणाम पर नहीं पहुंचता तो वह एक प्रतीक गढ़कर उसी को सत्य या ईश्वर मानने लगता है। यह आदमी की स्वाभाविक कमजोरी है। यथार्थवाद से पलायन अंधविश्वास की जड़ता उत्पन्न करता है। भारतीय समाज में यह कमजोरी बहुत व्यापक और दीर्घकालिक रही है। जब चिंतन-मनन की धारा सूख जाती है तो सत्य की खोज मूर्ति पूजा में बदल जाती है। जब अध्ययन के बाद मौलिक चिंतन का मन-मष्तिष्क में ह्रास हो गया तो आदमी भजन-कीर्तन में लग गया। यही हश्र हमारे राजनेताओं का हो गया है।
समाज में अंधविश्वास का बोलबाला इतना बढ़ गया है कि महाराष्ट्र में अंध श्रद्धा को निर्मूल करने का अभियान चलाने वाले नरेंद्र दाभोलकर की 2013 में हत्या कर दी गई थी। हालांकि बाद में उन्हीं के दिए प्रस्ताव को अंधविश्वास का पर्याय मानते हुए ठोस कानून बनाया गया। इस तरह से महाराष्ट्र अंधविश्वास के खिलाफ कानून लाने वाला पहला राज्य कहलाया। लेकिन इस कानून के अस्तित्व में आने के बाद भी महाराष्ट्र के नेताओं में खूब अंधविश्वास देखा गया और किसी के खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई नहीं की गई। अंधविश्वास के खिलाफ कानून लाने में भागीदारी करने वाले मंत्री ही अंधविश्वास की गिरफ्त में देखे गए। इस कानून का उल्लंघन राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता और राज्य के तत्कालीन श्रम मंत्री हसन मुशरिफ ने कर दिया था। इसी पार्टी के एक नाराज कार्यकर्ता ने उनके चेहरे पर काली स्याही फेंक दी थी। कालिख से पोत दिए जाने के कारण मंत्री महोदय कथित रुप से 'अशुद्ध' हो गए। इस अशुद्धि से शुद्धि का उपाय उनके समर्थकों ने दूध से स्नान करना सुझाया। फिर क्या था, नागरिकों को दिशा देनेवाले हसन मुशरिफ ने खबरिया चैनलों के कैमरों के सामने सैंकड़ों लीटर दूध से नहाकर देह का शुद्धिकरण किया। हालांकि अंध-श्रद्धा निर्मूलन कानून इतना मजबूत है कि यदि महाराष्ट्र सरकार श्रममंत्री के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई करने की इच्छाशक्ति जताती, तो उन्हें लेपेटे में ले सकती थी। इस कानून के दायरे में टोने-टोटकों के तांत्रिक, जादुई चमत्कार, दैवीय शक्ति की सवारी, व्यक्ति में आत्मा का अवतरण और संतों के ईश्वरीय अवतार का दावा करने वाले सभी पाखंड के दायरे में आते हैं। साथ ही मानसिक रोगियों पर भूत-प्रेत चढ़ने और प्रेतात्मा से मुक्ति दिलाने के जानकार भी इसके दायरे में हैं।
राजनेताओं के अंधविश्वास का यह कोई इकलौता उदाहरण नहीं है। कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री रहे वीएस येदियुरप्पा अक्सर इस भय से भयभीत रहते थे कि उनके विरोधी काला जादू करके उन्हें सत्ता से बेदखल न कर दें। लेकिन वे सत्ता से बेदखल हुए और खनिज घोटालों में भागीदारी के चलते जेल भी गए। इस दौरान उन्होंने दुष्टात्माओं से मुक्ति के लिए कई मर्तबा ऐसे कर्मकांडों को आजमाया, जो उनकी जगहंसाई का कारण बने। वास्तुदोष के भ्रम के चलते येदियुरप्पा ने विधानसभा भवन के कक्ष में तोड़फोड़ कराई। वसुंधरा राजे सिंधिया, रमन सिंह और शिवराज सिंह चौहान ने अपने मुख्यमंत्रित्व के पहले कार्यकालों में बारिश के लिए सोमयज्ञ कराए थे। मध्यप्रदेश के पूर्व विधायक किशोर समरीते ने मुलायम सिंह यादव को प्रधानमंत्री बनाने के लिए कामाख्या देवी के मंदिर पर 101 भैसों की बलि दी थी, लेकिन मुलायम अब तक प्रधानमंत्री नहीं बन पाए। आसाराम बापू, उनका पुत्र सत्य साईं तो अपने को साक्षात ईश्वरीय अवतार मानते थे। आज वे दुर्गति के किस हाल में हैं, किसी से छिपा नहीं है। यह चिंतनीय है कि देश को दिशा देने वाले राजनेता, वैज्ञानिक चेतना को समाज में स्थापित करने की बजाय, अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए तंत्र-मंत्र और टोने-टोटकों का सहारा ले रहे हैं। जाहिर है, ऐसे भयभीत नेताओं से समाज को दिशा मिलने वाली नहीं है। राजनेताओं को सांस्कृतिक चेतना और रुढ़िवादी जड़ताओं को तोड़ने वाले प्रतिनिधि के रुप में देखा जाता है। इसीलिए उनसे सांस्कृतिक परंपराओं से अंधविश्वासों को दूर करने की अपेक्षा की जाती है। इससे मानव समुदायों में तार्किकता का विस्तार हो, फलस्वरुप वैज्ञानिक चेतना संपन्न समाज का निर्माण हो। लेकिन हमारे यहां यह विडंबना ही है कि नेता और प्रगतिशील सोच का बुद्धिजीवी मानने वाले लेखक-पत्रकार भी खबरिया चैनलों पर ज्योतिषीय चमत्कार, तांत्रिक क्रियाओं, टोने-टोटकों और पुनर्जन्म की अलौकिक काल्पनिक गाथाएं गढ़कर समाज में अंधविश्वास फैलाने में लगे हैं। पाखंड को बढ़ावा देने वाले इन प्रसारणों पर कानूनी रोक लगाए बिना अंधविश्वास मिटना संभव नहीं है।