'जइहों कवन अवध मुंह लाई'

 


नरेंद्र मोदी का रामलला से पुराना नाता रहा है। उस समय विवादित ढांचा ध्वंस नहीं हुआ था। तब मौजूदा प्रधानमंत्री की भूमिका भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी के सहयोगी की थी। जोशी के ही साथ उन्होंने रामलला का दर्शन कर अपनी आस्था निवेदित की थी।
सवाल यह है कि नरेंद्र मोदी अयोध्या जाने से कतरा क्यों रहे हैं? क्या वे राम भक्तों को जवाब दे पाने की स्थिति में नहीं हैं या उनके मन में राम मंदिर निर्माण को लेकर कुछ और खिचड़ी पक रही है। सरकार बनने के पांच साल बाद ही सही, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहली बार अयोध्या जिले में पहुंचे। वहां उन्होंने जय श्रीराम के गगनभेदी नारे भी लगवाए। अयोध्या का धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व भी बताया। निश्चित रूप से प्रधानमंत्री की इस अयोध्या यात्रा का भाजपा को चुनाव में लाभ मिलेगा। संतों की नाराजगी दूर होगी। जिस तरह उन्होंने राम सर्किट, कृष्ण सर्किट, बौद्ध सर्किट और शिव सर्किट के निर्माण की बात की है, उससे सरकार की राम मंदिर निर्माण के प्रति गंभीरता झलकती है। प्रधानमंत्री अगर अयोध्या पहुंचकर कोई भी बयान देते तो उसका राजनीतिक लाभ तो पार्टी को मिल जाता लेकिन उससे ' सबका साथ-सबका विकास' की उनकी मुहिम कमजोर हो जाती। शायद यही वजह है कि प्रधानमंत्री ने अयोध्या पहुंचकर भी खुद को अयोध्या से दूर ही रखा।


 वे अयोध्या जाकर भी विवादित ढांचा जिसे भाजपा और और हिन्दू संगठन रामजन्म भूमि मानते हैं से दूर रहे। उनके अयोध्या न जाने से संत समाज, अवध क्षेत्र के नागरिक और यहां तक कि भगवान राम भी खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं। नरेन्द्र मोदी भी कारसेवक रहे हैं। यह बात उन्होंने अपने कई संभाषणों में स्वीकार भी की है। कारसेवकों ने भगवान राम को विश्वास दिलाया था कि 'रामलला हम आएंगे, मंदिर यहीं बनाएंगे।' लेकिन लगभग 25 वर्षों से टाट में बैठे रामलला अपने उद्धार की बाट जोह रहे हैं। इसमें संदेह नहीं कि राम मंदिर निर्माण का मुद्दा पिछले कई चुनावों में जीत-हार का प्रभावी कारक रहा है। इस बार भी लोकसभा चुनाव में उसकी प्रभावी भूमिका होगी। नरेंद्र मोदी की विशेषता है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद वे अभी तक जिस किसी भी तीर्थस्थल में गए हैं, अपनी तमाम व्यस्तताओं के बीच उन्होंने वहां के प्रमुख मंदिरों में दर्शन अवश्य किया है। ऐसे में लोग यह जानने में जुट गए हैं कि नरेंद्र मोदी जिनका राजनीतिक अभ्युदय ही राम मंदिर निर्माण आंदोलन से हुआ था, वह अयोध्या और राम मंदिर से दूरी क्यों बनाए हुए हैं? वर्ष 2014 में सत्ता में आने के बाद से पहली बार 1 मई, 2019 को अयोध्या आए भी लेकिन मूल अयोध्या से लगभग तीस किलोमीटर दूर से ही क्यों लौट गए? चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अयोध्या जिले की यात्रा के अपने राजनीतिक निहितार्थ हैं लेकिन न तो वे अयोध्या गए, न तो उन्होंने रामलला या हनुमान जी के दर्शन किए। इसके पीछे उनकी क्या रणनीति या क्या संकल्प है, वही जानें। नरेंद्र मोदी तीन बार अयोध्या आए हैं लेकिन तीनों बार उन्होंने अयोध्या से निश्चित दूरी बनाए रखी है। 2014 या 2009 में जब वे अयोध्या के आसपास आए थे तब अयोध्या भी फैजाबाद जिले में शामिल थी और अब अयोध्या जिले का हिस्सा फैजाबाद है। नरेंद्र मोदी ने गुसाईंगंज के रामपुर में चुनावी रैली की। जब राहुल और प्रियंका दोनों ही अयोध्या में हनुमान जी के दर्शन कर चुके हों, ऐसे में नरेंद्र मोदी का अयोध्या के इर्द-गिर्द रह जाना साधु-संतों की समझ नहीं आ रहा है। नरेंद्र मोदी उनके लिए अबूझ पहेली बन गए हैं। हालांकि इससे पहले उन्होंने जो चुनावी रैलियां की थीं, वे अयोध्या कस्बे से महज दस किलोमीटर ही दूर थीं। चुनाव के इस दौर में प्रधानमंत्री की अपनी राजनीतिक व्यस्तताएं हैं। ऐसे में अगर वे मूल अयोध्या नहीं पहुंचे तो उनकी आस्था पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। लेकिन प्रधानमंत्री रहते हुए पांच साल के दौरान मोदी अयोध्या क्यों नहीं आए?' यह सवाल न सिर्फ अयोध्यावासी, बल्कि साधु-संत भी पूछते रहे हैं। कई बार संतों ने इस बात से नाराजगी भी जताई है। उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि देशभर में भाजपा को राजनीतिक पहचान दिलाने में अयोध्या की बड़ी भूमिका रही है। वर्ष 1991 में उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की जब पहली बार कल्याण सिंह के नेतृत्व में सरकार बनी थी तो पूरा मंत्रिमंडल शपथ लेने के तत्काल बाद अयोध्या में रामलला के दर्शन के लिए पहुंच गया था। केंद्र सरकार के मंत्री भी ऐसा कर सकते थे। योगी सरकार के मंत्री भी कर सकते थे। कुंभ में तो पूरी योगी कैबिनेट ने ही संगम में गोते लगाए थे। पूरी मोदी सरकार नहीं तो, मोदी ही अयोध्या आकर रामलला के दर्शन कर सकते थे लेकिन ऐसा हुआ नहीं। अयोध्या के प्रति उनका यह बेगानापन समझ से परे है।
दो वर्ष में योगी आदित्यनाथ सरकार ने अयोध्या के विकास के लिए तमाम घोषणाएं की है। दीपावली के मौके पर भव्य कार्यक्रम और दीपोत्सव का आयोजन भी किया है। मुख्यमंत्री योगी तो अयोध्या आते ही रहते हैं। लेकिन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बतौर प्रधानमंत्री पूरा कार्यकाल बिता देने के बावजूद अयोध्या न आना और वह भी अयोध्या के पास चुनावी रैली को संबोधित कर चले जाना विस्मयकारी तो है ही। प्रधानमंत्री पिछले पांच साल में दर्जनों बार उत्तर प्रदेश आए हैं। वाराणसी उनका चुनाव क्षेत्र है। वह कबीरदास की समाधि स्थल मगहर भी पहुंचे हैं लेकिन अयोध्या नहीं गए। महंत नृत्यगोपाल दास के जन्म दिवस पर दो बार प्रधानमंत्री को आमंत्रित किया जा चुका है लेकिन वे अयोध्या नहीं आए। भाजपा ने इस बार अपने संकल्प पत्र में अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण को भी प्राथमिकता में रखा है। यह जरूर है कि पार्टी ने मंदिर निर्माण को संविधान के दायरे में रहकर ही पूरा करने का भरोसा दिया है। योगी सरकार अयोध्या में भगवान राम की 221 मीटर की भव्य प्रतिमा लगाने की घोषणा कर अपनी प्राथमिकता स्पष्ट कर चुकी है।
मामला अदालत में होने के बाद भी मंदिर निर्माण के पक्ष और विपक्ष में गलत बयानबाजी करने वालों के मुंह बंद नहीं हुए। इसकी वजह से कई सरकारें आईं और गईं। भगवान राम की कृपा से कल्याण सिंह जैसे नेता मुख्यमंत्री बने तो कारसेवकों पर गोली चलवाने वाले मुलायम सिंह यादव और बिहार में लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा रोककर उन्हें गिरफ्तार करने वाले लालू यादव ने भी मंदिर विरोध की सियासत में खूब नाम कमाया। बड़ा सच तो यह भी है कि देश के मौजूदा प्रधानमंत्री मोदी का राष्ट्रीय पटल पर अवतरण इसी रथ यात्रा के जरिए हुआ। 13 सितंबर 1990 को मोदी ने गुजरात इकाई के महासचिव (प्रबंधन) के रूप में रथ यात्रा के औपचारिक कार्यक्रमों और यात्रा के मार्ग के बारे में मीडिया को बताया था। सत्ता अगर उन्हें राम कृपा से मिल सकती है तो राम के कोप से भी उन्हें डरना चाहिए। राम मंदिर पर किसी भी तरह की घोषणा शायद वे इसलिए भी नहीं करना चाहते क्योंकि वे एक जिम्मेदार पद पर बैठे हैं। योगी आदित्यनाथ को भी पब्लिक के दबाव में कहना पड़ा था कि राम मंदिर हम ही बनाएंगे, दूसरा कोई नहीं बनाएगा। केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह भी लखनऊ में आयोजित युवा कुंभ में फंस गए थे। मोदी ऐसे माहौल में फंसकर असहज होना और कोई घोषणा कर विपक्ष को मौका नहीं देना चाहते। कारसेवकों का एक नारा था-'बच्चा-बच्चा राम का,जन्मभूमि के काम का।' विचारणीय यह है कि मोदी और योगी भगवान राम के काम क्यों नहीं आ पा रहे हैं जबकि वे सत्ता शीर्ष पर हैं। कुछ करने का अधिकार भी उनके पास है। मोदी ने अगर कोई संकल्प कर रखा है कि वे अयोध्या तभी जाएंगे, रामलला के दर्शन तभी करेंगे,जब भव्य राम मंदिर बन जाएगा तो उन्हें अपने इस संकल्प को सार्वजनिक करना चाहिए अन्यथा उनका यह मौन संकल्प जनमानस में भ्रांति पैदा कर सकता है। अयोध्या, काशी और प्रयागराज की धर्म संसद में राम मंदिर निर्माण में विलंब और सरकार की अन्मन्यस्कता का मुद्दा उठ चुका है। ऐसे में नरेंद्र मोदी का अयोध्या से दूरी बनाना कचोटता भी है और सरकार की नीति और नीयत पर सवाल भी उठाता है।