मायावती आंबेडकरवादी नहीं, छद्म दलित हैं, डाॅ. निर्मल

लखनऊ। लखनऊ बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने गठबंधन को आंबेडकरवादी बताते हुए अन्य दलों को फर्जी आंबेडकरवादी बताया है, जबकि हकीकत है कि मायावती खुद आंडबरवादी है न कि आंबेडकरवादी! मायावती ने दलितों के वोटों की नीलामी की है। बाबा साहेब का जब लंदन का बंगला नीलाम हो रहा था, तब मायावती गहरी नींद में थीं। बंबई की इंदुमिल की जमीन जब बिक रही थी, तब मायावती ने कोई कदम क्यों नहीं उठाया। मायावती ने बाबा साहेब की धरोहरों को सहेजने के लिए कोई काम नहीं किए। यहाँ तक जब दलितों का प्रमोशन में रिजर्वेशन छींना गया, तब भी मायावती का आंबेडकरवाद नहीं जागा। सरकारी जमीनों पर दलितों के पट्टा मिलने की अनिवार्यता जब अखिलेश यादव की सरकार खत्म हुई, तब भी मायावती फर्जी आंबेडकरवादी बनी रहीं। इस तरह का आंबेडकरवाद राष्ट्र की आँखों में धूल नहीं झोक सकता हैं। यह आंबेडकरवाद नहीं, आंडबरवाद है। मायावती इसी आंडबरवाद की बदौलत अपनी राजनीति चमकाती रही हैं, लेकिन हकीकत है कि वह खुद इस दलदल में फँस चुकी हंै। देश उनकी हकीकत जान चुका है।


मायावती को खुद यह साबित करना होगा कि वह दलित हैं या नहीं। क्योंकि वह खुद को अपनी आत्मकथा मंे जाटव जाति बताती हैं। जबकि हकीकत है कि वर्ष 1935 के भारतीय अनुसूचित जातियों के गजेटियर (अनुसूचित जातियों की पहली सूची) में जाटव जातियों का कोई उल्लेख नहीं है। ऐसे में मायावती दलित कैसे हो गई और कब हो गई, उनको यह साबित करना होगा। मायावती ने दलितों को खंड-खंड जातियों में बाँटने का काम किया। दलित समाज को लेकर बाबा साहब ने यह सपना नहीं देखा था। मायावती जिस सपने को देखती हैं, बाबा साहब उसके बिलकुल विरोधी थे। दलितों के सशक्तिकरण ने लिए जातियों को खत्म करने की बात बाबा साहेब करते हैं। जबकि मायावती अपनी राजनीति चमकाने के लिए दलित जातियों को बनाए रखने और आपस में लड़ाने की बात करती हैं। ऐसे में यह मायावती का यह कहना कि वह और उनका गठबंधन ही केवल आंबेडकरवादी है, दलित की आँख में धूल झोंकने जैसा है। दलित मायावती को आंबेडकरवादी नहीं आडंबरवादी मानने लगे हैं। सच्चे अर्थों में मायावती आंबेडकरवादी होने का बयान भी केवल चुनाव के दौरान ही देती है। उनकी सत्ता की भूख उन्हें आंडबरवादी बनने पर मजबूर करती है।


प्रधानमंत्री नरंेद्र मोदी ने लंदन किंग्स हेनरी स्थित बाबा साहेब के उस मकान को स्मारक बनाने का काम किया, जो नीलाम हो रहा था। पंचतीर्थ बनवाने का काम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया। यही नहीं, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सरकारी दफ्तरों में बाबा साहेब की तस्वीर लगवाने का आदेश दिया। यह काम चार बार मुख्यमंत्री रहने के बाद भी मायावती नहीं कर पाई। ऐसे में मायावती का ये कहना कि वह आंबेडकरवादी हैं खुद अपने आप में बड़ा मजाक है। मायावती का ये आखिरी चुनाव है। इसके बाद वह खत्म हो जाएंगी। दलित अब मायावती को सबक सिखाने की तैयारी मंे है।