मसूद को लेकर चीन की दीवार ढही, भारत की कूटनीतिक जीत

 त्रिनाथ के. शर्मा  


पाकिस्तान की सरजमीं पर बैठकर भारत में आतंक की नर्सरी चला रहे कुख्यात आतंकी मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित कराने में आखिरकार मौजूदा केन्द्र सरकार कामयाब रही। इसे सरकार की बहुत बड़ी कूटनीतिक सफलता मानी जाएगी। मसूद को ग्लोबल टेरेरिस्ट घोषित कराने में भारत सरकार के सतत प्रयासों के चलते अंततः चीन भी दस वर्षों में पहली बार झुकने को मजबूर हुआ। दरअसल 14 फरवरी को पुलवामा में भारतीय सुरक्षा बलों पर पाक के आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी हमले के चंद दिनों बाद फ्रांस, ब्रिटेन तथा अमेरिका द्वारा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की 1267 अलकायदा प्रतिबंध समिति में इस संगठन के मुखिया मसूद अजहर के खिलाफ प्रस्ताव लाया गया था, किन्तु चीन लगातार मसूद को संयुक्त राष्ट्र की काली सूची में डाले जाने के इन प्रयासों में तकनीकी अड़ंगा लगाते हुए प्रस्ताव पर विचार करने के लिए बार-बार अतिरिक्त समय मांगता रहा। मार्च माह में उसने मसूद पर प्रतिबंध लगाने के प्रस्ताव पर चौथी बार वीटो लगा दिया था। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की यह वही काली सूची है, जिसमें दुनिया के लिए खतरा बने आतंकी संगठनों और उनके आकाओं को रखा जाता है। अलकायदा प्रतिबंध समिति या 1267 प्रतिबंध समिति दुनियाभर के आतंकियों के बारे में जानकारी एकत्रित कर उन पर प्रतिबंध लगाने संबंधी फैसले लेती है। 
चीन चूंकि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में 'वीटो' की शक्ति रखने वाले देशों में शामिल है। इसलिए उसकी स्वीकृति के बगैर मसूद अजहर पर प्रतिबंध लगाया जाना लगभग असंभव ही था। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में करीब 193 देश शामिल हैं, जिनमें अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस तथा चीन कुल पांच स्थायी सदस्य हैं। संयुक्त राष्ट्र में कोई भी अहम फैसला तभी लिया जा सकता है, जब सभी पांचों स्थायी सदस्य एकमत हों। इसलिए चीन की असहमति के चलते मसूद को वैश्विक आतंकी घोषित करना संभव नहीं था। यही कारण रहा कि भारत सरकार ने कुशल कूटनीति का परिचय देते हुए चीन को संयुक्त राष्ट्र में न केवल इस मुद्दे पर पूरी तरह से अलग-थलग कर दिया बल्कि चीन पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनवाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। मसूद पर पाबंदी के बाद अब पूरी दुनिया के समक्ष एक बार फिर यह भी प्रमाणित हो गया है कि पाकिस्तान ही जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा जैसे कई आतंकी संगठनों की जन्मस्थली और शरणस्थली है। आतंक का सारा कारोबार उसी की जमीन से उसी के हुक्मरानों की नाक के नीचे संचालित होता रहा है, जिसे वहां की सेना तथा आईएसआई की ओर से हरसंभव मदद मिलती रही है।
भारत की इससे बड़ी कूटनीतिक सफलता भला और क्या होगी कि जो चीन मसूद अजहर जैसे कुख्यात आतंकी सरगना को बचाने के लिए पिछले 10 साल से संयुक्त राष्ट्र में लगातार अपने वीटो पावर का इस्तेमाल करता रहा, उसी चीन को घुटनों के बल बैठने पर विवश कर दिया गया। स्मरण रहे कि सर्वप्रथम भारत ने 2009 में संयुक्त राष्ट्र में मसूद अजहर पर प्रतिबंध के लिए प्रस्ताव पेश किया था। उसके बाद दूसरी बार वर्ष 2016 में अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस के साथ मिलकर भारत ने संयुक्त राष्ट्र की 1267 प्रतिबंध परिषद के समक्ष यह प्रस्ताव रखा। चीन द्वारा उस बार भी अड़ंगा लगाए जाने के बाद भारत ने तीसरी बार 2017 में इन्हीं देशों के समर्थन के साथ फिर यह प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में रखा। लेकिन मसूद को वैश्विक आतंकी घोषित कराने के प्रयासों को चीन ने कभी सफल नहीं होने दिया। इस बार पुलवामा हमले में 44 जवानों की शहादत के बाद भारत सरकार जिस प्रकार चीन पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने में सफल हुई, उसी का परिणाम है कि चीन को मसूद पर पाबंदी के प्रस्ताव पर अपना वीटो हटाने पर विवश होना पड़ा। पुलवामा हमले के बाद भारत ने जिस प्रकार की सख्त कार्रवाई की, उसके बाद चीन को भी समझ आने लगा था कि क्षेत्रीय सुरक्षा के लिहाज से इस मामले को लगातार टालते रहना अब उसके लिए ठीक नहीं होगा। सीधे शब्दों में कहें तो यह एक प्रकार से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की बढ़ती ताकत का जीता-जागता प्रमाण है।
हालांकि अब चीन का कहना है कि उसे मसूद अजहर को आतंकी घोषित किए जाने के प्रस्ताव में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगा। इसीलिए उसने जैश सरगना मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित करने पर लगी रोक हटा ली है। वास्तव में हकीकत यही है कि चीन पर अंतरराष्ट्रीय दबाव इस कदर बढ़ गया था कि संयुक्त राष्ट्र की प्रधान इकाई में राजनयिकों द्वारा यह चेतावनी दे दी गई थी कि अगर उसने मसूद अजहर को ग्लोबल टेरेरिस्ट घोषित कराने में इसी प्रकार अड़ंगा डालना जारी रखा तो सुरक्षा परिषद के वीटो शक्ति प्राप्त दूसरे सदस्य देश अन्य कार्रवाई करने के लिए मजबूर होंगे। अहम सवाल यह है कि आखिर चीन क्यों हर कदम पर पाकिस्तान में बैठकर भारत में तबाही फैला रहे आतंकियों के मामले में पाकिस्तान का साथ देता रहा है? दरअसल चीन के पाकिस्तान के साथ बहुत गहरे आर्थिक और राजनीतिक संबंध हैं। चीन-पाक आर्थिक गलियारा परियोजना चल रही है। पाकिस्तान में चीन के अपने कारोबारी हित निहित हैं। चीन अपने शहर काशगर से पाकिस्तान के ग्वादरपोर्ट तक इकोनॉमिक कॉरिडोर बना रहा है। इसके अलावा वह भारत को अपना सबसे बड़ा आर्थिक तथा राजनीतिक प्रतिद्वंदी भी मानता है। यही वजह है कि वह सब कुछ जानते-समझते हुए भी पाकिस्तान में पल रहे दुर्दान्त आतंकियों के मामले में सदैव पाकिस्तान का हिमायती बनकर आंखें मूंदता रहा है।
अब बात मसूद द्वारा भारत में किए गए कुछ बड़े हमलों की करते हैं। अक्टूबर 2001 में जम्मू-कश्मीर विधानसभा पर किए गए आतंकी हमले में 38 लोगों की मौत हुई थी। उसके दो महीने बाद दिसम्बर 2001 में अजहर ने लश्कर-ए-तैयबा के साथ मिलकर भारत की संसद पर हमला किया, जिसमें हमारे 8 जांबाज जवान वीरगति को प्राप्त हुए थे। सितम्बर 2016 में जम्मू-कश्मीर के उरी सेक्टर में भारतीय सुरक्षाबलों पर हमले में 19 जवानों को मौत की नींद सुला दिया गया। 14 फरवरी 2019 को जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में सुरक्षा बलों के काफिले पर हमला कर मसूद के संगठन ने 44 जवानों की हत्या कर दी थी।
सवाल यह कि मसूद अजहर आखिर है कौन और क्यों भारत सरकार द्वारा पिछले दस वर्षों से उसे वैश्विक आतंकी घोषित कराने के लिए प्रयास किए जा रहे थे? पाकिस्तान के बहावलपुर में 10 जुलाई 1968 को जन्मा मसूद पाक अधिकृत कश्मीर में सक्रिय आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद का संस्थापक और मुखिया है। वह भारत में अभी तक 300 से भी ज्यादा आतंकी हमलों को अंजाम दे चुका है। इसके चलते वह भारत के सर्वाधिक वांछित आतंकियों की सूची में शामिल था। उसने 8वीं कक्षा तक पढ़ाई करने के बाद मुख्यधारा का स्कूल छोड़ दिया था और कराची में बानुरी नगर के जामिया उलूमउल इस्लामिया नामक मदरसे में दाखिला ले लिया। उसी दौरान उसका सम्पर्क हरकत-उल-अंसार से हुआ और थोड़े ही समय में वह 'हरकत' की उर्दू पत्रिका 'साद-ए-मुजाहिद्दीन' तथा अरबी पत्रिका 'सावत-ए-कश्मीर' का सम्पादक बन गया। कुछ समय बाद वह हरकत-उल-अंसार का जनरल सेक्रेटरी बना दिया गया, जिसके बाद वह हरकत में आतंकियों की नई भर्तियां करने, चंदा एकत्रित करने तथा वृहद् इस्लामी गणराज्य की स्थापना व इस्लाम के प्रचार-प्रसार के लिए विदेश यात्राएं करने लगा।
1993 में भारतीय सेना ने कश्मीर में हरकत-उल-मुजाहिद्दीन को कुचल दिया था और नवम्बर 1993 में उसके सरगना नसरूल्लाह मंसूर लंगरयाल को बंदी बना लिया था। उसके बाद कश्मीर में 'हरकत-उल-जिहाद-अल -इस्लामी' तथा 'हरकत-उल-मुजाहिद्दीन' के बीच खराब होते संबंधों को सुधारने के मंसूबे से वर्ष 1994 में मसूद अजहर पुर्तगाली पासपोर्ट के जरिये बांग्लादेश के रास्ते कश्मीर में आतंक को बढ़ावा देने श्रीनगर आया। उसकी बढ़ती आतंकी गतिविधियों के चलते फरवरी 1994 में उसे सज्जाद अफगानी के साथ अनंतनाग में गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। दिसम्बर 1999 में मसूद को जेल से छुड़ाने के लिए उसके भाई इब्राहिम अतहर तथा मसूद के अन्य साथियों ने काठमांडू से दिल्ली आ रहे इंडियन एयरलाइंस के विमान आईसी-814 को हाईजैक कर लिया। वे विमान को अमृतसर, लाहौर, दुबई होते हुए अफगानिस्तान में कंधार ले गए, जहां उस वक्त तालिबानी शासन था। विमान में उस समय 178 लोग सवार थे, जिनकी सुरक्षित वापसी के लिए तत्कालीन सरकार को झुकना पड़ा और 31 दिसम्बर 1999 को मसूद तथा उसके दो अन्य साथियों सईद शेख व मुस्तफा को जम्मू की कोट भलवाल जेल से रिहा कर कंधार ले जाकर छोड़ दिया गया। वहां से वह अल-कायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन से मिलने गया और अगले ही महीने पाकिस्तान चला गया। कराची की एक मस्जिद में उसने 'हरकत-उल-अंसार' से संबंध तोड़कर सैकड़ों हथियारबंद आतंकियों के साथ खुद के नए आतंकी संगठन 'जैश-ए-मोहम्मद' की स्थापना की, जो मौजूदा समय में कश्मीर में सक्रिय सर्वाधिक खतरनाक आतंकी संगठनों में से एक माना जाता है।
अब मसूद को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित करने के बाद अब उसकी सम्पत्ति फ्रीज होने के साथ-साथ उसकी यात्राओं और हथियारों पर प्रतिबंध लगना तय है। अब कोई भी देश उसे हथियार उपलब्ध नहीं करा सकेगा। वह जहां कहीं भी रहेगा, वहां से उसे देश-विदेश यात्राएं करने की इजाजत नहीं दी जाएगी। उसकी तथा उसके संगठन की जिस भी देश में सम्पत्तियां होंगी, सभी जब्त कर ली जाएंगी। इसके बदले उसे किसी भी प्रकार की कोई वित्तीय सहायता नहीं दी जाएगी। इसके अलावा पाकिस्तान में तो उसे नजरबंद रखा जाएगा।