राजनाथ के  मुकाबले ‘संत’ और सितारे

लखनऊ में बैठकर सपा और बसपा ने कई-कई बार उत्तर प्रदेश का राजकाज चलाया, लेकिन इस शहर ने आज तक इन पार्टियों को अपनी नुमाइंदगी का मौका नहीं दिया। सपा और बसपा लखनऊ लोकसभा सीट पर आज तक अपना खाता नहीं खोल पाईं। आजादी के बाद यहां से कांग्रेस जीतती रही तो 1991 से इस सीट पर भाजपा ने कब्जा कर लिया। भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी लखनऊ  को कुछ ऐसे भाये कि 1991, 1996, 1998, 1999 और 2004 के लोकसभा चुनावों में यहां से वही चुने गए। जबकि उन्हीं को लखनऊ   ने 1957 और 1962 में हरा कर लौटा दिया था। अटल के खिलाफ यहां राजबब्बर, नफीसा अली और मुजफ्फर अली जैसे सितारे उतारे गए, पर सब उनसे हार गए। साल 2009 में यहां से भाजपा के लालजी टंडन जीते और 2014 में राजनाथ सिंह ने 16वीं लोकसभा में यहां का प्रतिनिधित्व किया। इस बार फिर राजनाथ मैदान में हैं। उनसे मुकाबले के लिए कांग्रेस ने 'संत' प्रमोद कृष्णम् और सपा ने पूर्व अभिनेत्री पूनम सिन्हा को उतारा है। पूनम भाजपा छोड़कर कांग्रेस का दामन थाम चुके अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा की पत्नी हैं। 


दोपहर के 12 बज रहे हैं। सूरज सिर पर  है। सड़कों पर जहां जाम और गाड़ियों के हॉर्न का शोर है, वहीं चौक से करीब छह किलोमीटर दूर पुराने सरफराजगंज की गलियों में सन्नाटा पसरा है। हर दूसरे घर में चिकन के कपड़ों पर जाली का काम हो रहा है। क्या औरत, क्या आदमी सब इसी में मशगूल हैं। 12-14 घंटे तक लगातार काम कर दिन के 50 रुपये कमाने की जद्दोजहद जारी है। पुराने सरफराजगंज में उनकी आबादी है, जिनके लिए सियासी दल जुबानबाजी तो खूब करते हैं, लेकिन यहां उनके हालात देखने कोई नहीं आता। जमीला कहती हैं, एक कपड़े पर जाली बनाने के तीन से पांच रुपये मिलते हैं। हमारा मेहनताना पैसों में बढ़ता है, रुपयों में नहीं। पूरा घर साल भर 10-12 घंटे रोज काम करता है, तब जाकर सालाना 40-50 हजार रुपये जमा कर पाते हैं। हमारी क्या रायशुमारी? गुरबत हमारा नसीब है। वह दुपट्टे से मुंह पोछ फिर जाली बनाने के लिए कपड़ा उठा लेती हैं। यहां जमीला सरीखी सैकड़ों औरतें हैं जो अपनी रोजी-रोटी के लिए यह काम कर रही हैं लेकिन उन्हें हालात सुधरते नहीं दिखते। 


पुराने सरफराजगंज के पास ही है इरा मेडिकल कॉलेज, जिसे आसपास के लोग हसरत से देखते हैं। बमुश्किल 200 मीटर की दूरी पर रहने वाले यूसुफ इससे बहुत खुश हैं। बताते हैं, पिछले साल हमने साल भर में 30 हजार रुपये बचाए और अपने एक कमरे में एसी लगा कर किराये पर उठा दिया। जिस कमरे का हमें दो-तीन हजार भी मुश्किल से मिलता था, उसका आठ-दस हजार मिलने लगा। अब हमारे लिए तो यही तरक्की है। वोट देने के नाम पर उन्हें वही दल भाते हैं जो उनकी बात करते हैं। 


चौक-चौराहे पर ट्रैफिक 'जल्दी किसको है' की तर्ज पर रेंग रहा है। विक्टोरिया स्ट्रीट से दायें मुड़ने पर संकरी सड़क और बीच में लगा अस्थायी डिवाइडर बताता है कि जाम से निपटने के लिए कुछ इंतजाम तो बीते बरसों में हुए हैं। 
यहीं पर है लखनऊ का पुराना बर्तन बाजार। यहियागंज में कन्हैयालाल काशीनाथ फर्म के राकेश अग्रवाल कहते हैं, जीएसटी और नोटबंदी से हम परेशान जरूर हुए। हमारा समय अब कागजी कामों में भी जाता है। इसके बावजूद हमारा वोट देश की बेहतरी के लिए  होगा, छोटी-मोटी दिक्कतों से क्या घबराना। यहां से थोड़ा आगे बढ़ने पर यहियागंज की गल्ला मंडी में अनाज तौल रहे राम पाल कहते हैं, हम गरीब जरूर हैं लेकिन जब हमारे देश ने पुलवामा का बदला लिया तो हमें भी बहुत अच्छा लगा। अरे, देश पहले है। 


पत्रकारपुरम चौराहे पर गायत्री स्वीट्स पर छोले-भटूरे तले जा रहे हैं। दो-तीन लोग हैंगर पर कपड़े बेच रहे हैं और उनमें मोदी के काम को लेकर बहस जारी है। नोटबंदी, जीएसटी से बात पुलवामा और बालाकोट तक पहुंचकर गर्मागर्मी की शक्ल ले रही है। आवाजें कुछ कर्कश होने लगीं तो भीड़ लग गई। कुछ देर में वे दोनों तो अलग हो गए लेकिन बाकी लोगों को मौका मिल गया। 


हैंगर पर कपड़े बेच रहे देवराज ने कहा, गरीबों के लिए जो सोचेगा, हम उसी को वोट देंगे। वहीं मोज्जअमनगर के मो. शरीफ ने कहा कि पुराने लखनऊ में विकास के नाम पर कुछ नहीं हुआ। सीवर लाइन जैसी बुनियादी सुविधा नहीं मिल पाई।  लेकिन उनकी बात को काटा गोमती नगर के सुरेश ने। सुरेश ने कहा, मेट्रो चली न? पूरे शहर में सुलभ शौचालय खुले, सड़कें ठीक हुईं, लखनऊ साफ हुआ। पुराने लखनऊ में लोग कटिया से बिजली जलाएंगे और बातें बड़ी-बड़ी करेंगे। लोग सुरेश के साथ हो लिए। अब बातों का रुख इस तरफ मुड़ गया कि पुराने लखनऊ में कटिया लगाकर बिजली लेने वालों से भाजपा सरकार भी नहीं निपट पाई।  


एक ट्रैवेल एजेंसी चला रही समीना खान कहती हैं कि मूल समस्याओं की चर्चा ही नहीं है। लखनऊ से जेद्दा, कुवैत या अन्य खाड़ी देशों में जाने वाले मजदूरों या कारीगरों की संख्या बहुत घट गई है। कारण कि नियम बहुत सख्त हो गए हैं। पहले हम रोज 150-200 इसीआर (इमीग्रेशन चेक रिक्वायर्ड) करते थे लेकिन अब 20-20 दिन तक कोई नहीं आता। इसमें कोई शक नहीं कि भारतीयों का शोषण न होने पाए, इसके लिए नियमों को सख्त किया गया था। लेकिन इसका यह नतीजा निकला। अब जिन घरों की रोजी-रोटी छिन गई, वे वोट किसे देंगे, इसे समझा जा सकता है। 


 योजनाओं का हाल लें तो कहीं लोगों को लगता है कि केंद्र सरकार का कामकाज संतोषजनक रहा है तो कुछ को लगता है कि काम सिर्फ गिनाए गए, किए नहीं गए। गोलागंज के सईद को लगता है कि सरकारी योजनाओं का लाभ मुस्लिम बहुल इलाकों को नहीं मिला। वह अपनी गैस एजेंसी का उदाहरण देते हैं कि यहां से अगर उज्ज्वला के 100कनेक्शन दिए गए तो  उनमें से एक-दो ही मुस्लिम को मिले। लेकिन गांवों में उज्ज्वला योजना को लेकर ज्यादा शिकायतें नहीं हैं। कांग्रेस की न्याय योजना भी लोगों को हवाई योजना मात्र लग रही है। जबकि जम्मू-कश्मीर से धारा 370 को हटाने के भाजपा के वायदे को ज्यादातर लोग पॉलिटिकल स्टंट मानते हैं। वे यह भी मानते हैं कि रोजगार के मोर्चे पर मोदी सरकार काफी हद तक असफल रही है। इसके बावजूद लोग उन्हें एक और मौका देने को तैयार हैं। ज्यादातर लोगों को लगता है कि आतंकवाद से निपटने में केंद्र को कामयाबी मिली है। हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि सरकार काम कम, पर प्रचार ज्यादा करती है