मुस्लिम विद्वेष के जरिये भाजपा के हेट -पॉलिटिक्स की सारी चाल बिखर कर रह जाएगी

त्रिनाथ के.शर्मा




नागरिकता संशोधन कानून को हथियार बनाकर मुस्लिम-विद्वेष एक नया अध्याय रचने में जुट गए हैं


मुस्लिम विद्वेष के जरिये भाजपा के हेट -पॉलिटिक्स की सारी चाल बिखर कर रह जाएगी


दुनिया का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास है


आज मोदी-शाह 2024 को दृष्टिगत रखते हुए एक बार फिर संघ के अनुषांगिक संगठनों, मीडिया, लेखक-पत्रकारों, साधु-संतों के सहयोग से नागरिकता संशोधन कानून को हथियार बनाकर मुस्लिम-विद्वेष एक नया अध्याय रचने में जुट गए हैं। अतीत के अनुभव के आधार पर विपक्ष को यह मानकर चलना चाहिए कि संघ परिवार का मुस्लिम-विद्वेष हथियार हमेशा कारगर हुआ है और वह उसकी प्रभावी काट ढूँढऩे में अबतक व्यर्थ रहा है। किन्तु हेट पॉलिटिक्स के समक्ष लगातार दो बार बुरी तरह मात खा चुका विपक्ष अगर 2024 में भाजपा को रोकना चाहता है तो उसे हर हाल में इसकी काट ढूंढऩी ही होगी। यह कैसे मुमकिन होगा इस पर गैर-भाजपाई नेता और बुद्धिजीवी विचार करें। किन्तु इस लेखक का मानना है कि यह काम धर्म की जगह आॢथक आधार पर वर्ग-निर्माण को बढ़ावा देकर किया जा सकता है,ताकि वर्ग-शत्रु के रूप में मुसलमानों की जगह कोई और तबका उभरकर सामने आये। और इस किस्म का वर्ग-निर्माण करने लायक वर्तमान में अभूतपूर्व स्थितियां और पारिस्थितियाँ पूंजीभूत हैं। अब जहां तक संघ के असल वर्ग – शत्रु का सवाल है, वह मुसलमान नहीं, दलित-आदिवासी और पिछड़े हैं। इनके ही हाथ में सत्ता की बागडोर जाने से रोकने लिए हेडगेवार ने प्राय: 95 वर्ष पूर्व हेट पॉलिटिक्स का सूत्र रचा था, जिसका मंडल उत्तर काल में भाजपा ने जमकर सदव्यवहार किया। चूंकि देखने में संघ के सीधे निशाने पर मुसलमान रहे, किन्तु असल शत्रु बहुजन ही हैं, इस कारण ही उसके राजनीतिक संगठन भाजपा ने 'हेट पॉलिटिक्स से मिली सत्ता का इस्तेमाल मुख्यत: बहुजनों के खिलाफ किया।
भारतीय राजनीति की साधारण समझ रखने वालों को भी पता है कि जिस किस्म की राजनीति के सहारे आज भाजपा विश्व की सर्वाधिक शक्तिशाली पार्टी के रूप में इतिहास में नाम दर्ज कराने में सक्षम हुई है, उसके सूत्रकार रहे वह डॉ. हेडगेवार, जिन्होंने अपने लक्ष्य को साधने के लिए एक भिन्न किस्म के वर्ग-संघर्ष की परिकल्पना की थी। वर्ग-संघर्ष के सिद्धान्तकर कार्ल माक्र्स ने कहा है कि दुनिया का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास है। एक वर्ग वह है जिसका उत्पादन के साधनों पर कब्$जा है और दूसरा वह है, जो इससे बहिष्कृत व वंचित है। इन उभय वर्गों में कभी समझौता नहीं हो सकता। इनके मध्य सतत संघर्ष जारी रहता है। कोलकाता की अनुशीलन समिति, जिसमे गैर-सवर्णों का प्रवेश निषिद्ध था, के सदस्य रहे डॉ. हेडगेवार के समय पूरा भारत अंग्रेजों को वर्ग- शत्रु मानते हुए, उनसे भारत को मुक्त कराने में संघर्षरत था। किन्तु डॉ. हेडगेवार ने एकाधिक कारणों से अंग्रेजों के बजाय मुसलमानों के रूप में एक नया 'वर्ग-शत्रुÓ खड़ा करने की परिकल्पना की। उन्हें अपनी परिकल्पना को रूप देने की प्रेरणा 1923  में प्रकाशित विनायक दामोदर सावरकर की पुस्तक 'ङ्क्षहदुत्व: हिन्दू कौन?Ó से  मिली, जिसमे उन्होंने अपने सपनों के भारत निर्माण के लिए अंग्रेजों की जगह 'मुसलमानों को प्रधान शत्रुÓ चिन्हित करते हुए, उनके विरुद्ध जाति-पाति का भेदभाव भुलाकर सवर्ण-अवर्ण सभी हिन्दुओं को ' हिन्दू – वर्गÓ (संप्रदाय) में उभारने का बलिष्ठ प्रयास किया था।1923 के पूर्व कुछ ऐसे हालात पैदा हो चुके थे, जिसमें डॉ. हेडगेवार के समक्ष 'हिन्दू -वर्ग 'बनाने से भिन्न विकल्प नहीं रहा। इन विगत वर्षों में अंग्रेजों द्वारा आविष्कृत 'आर्यतत्व के बाद पुणे के चित्तपावन ब्राह्मण तिलक के नेतृत्व में ब्राह्मण विद्वानों द्वारा 'ब्राह्मणों को आर्य प्रमाणित करने की होड़ तुंग पर पहुंच चुकी थी। इस बीच 1922 में सिन्धु सभ्यता के उत्खनन के सत्यान्वेषण ने भारत में आर्यों के आगमन की पुष्टि कर दी थी। उधर सिन्धु सभ्यता के सत्यान्वेषण और ज्योतिबा फुले के आर्य-अनार्य सिद्धांत से प्रेरित इ।व्ही। रामासामी पेरियार दक्षिण भारत में मूलनिवासीवाद का मंत्र फूंककर ब्राह्मण वर्चस्व की जमीन दरकाना शुरू कर चुके थे।


केंद्र की सत्ता पर काबिज मोदी सरकार ने नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और एनआरसी की दिशा में जो कदम उठाया है, उससे नोटबंदी जैसे तुगलकी फैसले के बाद पूरे देश के अवाम का जीवन फिर एक बार बुरी तरह प्रभावित होने जा रहा है। लेकिन नोटबंदी ने पूरे देश को सड़कों पर जरुर ला खड़ा किया था, किन्तु उससे देश जला नहीं था, जबकि आज जल रहा है।  इसे लेकर देश में जिस तरह ङ्क्षहसा का माहौल गरमा रहा है, उसे देखते हुए खुद भाजपा की कई सहयोगी पाॢटया चेतावनी देते हुए कह रही हैं कि अगर इस कानून को खत्म नहीं किया गया तो इसके विरोध में जारी ङ्क्षहसा भविष्य में गृह युद्ध में बदल सकती है। लेकिन मोदी-शाह की सेहत पर इससे कोई असर पड़ता दिख नहीं रहा है। बहरहाल सीएए, एनपीआर और एनआरसी पर जिस तरह मोदी-शाह बार-बार पाकिस्तान को इंगित करते हुए दलीलें दे रहे है, उससे ऐसा लगता है कि संघ परिवार  एक बार फिर डॉ. हेडगेवार के उस 'हेट- पॉलिटिक्स की एक नयी पारी का आगाज कर दिया है, जिसके सहारे ही कभी दो सीटों पर सिमटी भाजपा नयी सदी में अप्रतिरोध्य बन गयी।


इसके पूर्व इंग्लॅण्ड में एडल्ट फ्रेंचाइज (व्यस्क मताधिकार) आन्दोलन के सफल होने की सम्भावना उजागर हो चुकी थी। इन सब घटनाओं पर किसी की सजग दृष्टि थी तो डॉ. हेडगेवार की। उन्होंने अपनी प्रखर मनीषा से यह उपलब्धि कर लिया था कि भारत अंग्रेजों के लिए बोझ बन चुका है और वे इसे निकट भविष्य में छोड़कर स्वदेश चले जायेंगे। उनके जाने के बाद आजाद भारत में भी इंग्लॅण्ड में शुरू हुआ व्यस्क मताधिकार लागू होगा। वैसे में विशिष्ट जन ही नहीं, भूखे अधनंगे दलित- आदिवासी- पिछड़ों को भी वोट देने: अपना प्रतिनिधि चुनने का अधिकार मिलेगा। तब वे और चाहे कुछ करें या न करें, किन्तु तिलक, नेहरु इत्यादि विशिष्ट ब्राह्मण विद्वानों ने जिन्हें विदेशी(आर्य) प्रमाणित किया है, उन्हें तो वोट नहीं देंगे। और जब विशाल वंचित वर्ग ब्राह्मणों को अपने वोट से महरूम कर देगा, तब वे सत्ता से दूर छिटक जायेंगे। इसी ङ्क्षचता ने डॉ. हेडगेवार को तत्कालीन ब्राह्मण विद्वानों के विपरीत 'आर्य समाज की जगह हिन्दू समाज बनाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने भारतीय समाज के गहन अध्ययन के बाद यह सत्योप्लब्धि कर लिया था कि जब हिन्दू धर्म-संस्कृति के नाम पर आन्दोलन से लोगों को ध्रुवीकृत किया जायेगा तो उससे जो विशाल हिन्दू समाज बनेगा, उसका नेता ब्राह्मण होंगे ही होंगे। 


इस दूरगामी सोच के तहत ही डॉ. हेडगेवार ने 'हिन्दू धर्म-संस्कृति के उज्ज्वल पक्ष और मुख्यत: मुस्लिम विद्वेष के प्रसार के आधार पर आरएसएस को खड़ा करने की परिकल्पना किया. हेडगेवार से यह गुरुमंत्र पाकर संघ लम्बे समय से चुपचाप काम करता रहा। किन्तु मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद जब बहुजनों के जाति चेतना के चलते सत्ता की बागडोर दलित – पिछड़ों के हाथ में जाने का आसार दिखा, तब संघ ने राम जन्मभूमि मुक्ति के नाम पर, अटल बिहारी वाजपेयी के शब्दों में आजाद भारत का सबसे बड़ा आन्दोलन खड़ा कर दिया, जिसमे मुस्लिम विद्वेष के भरपूर तत्व थे। राम जन्म भूमि मुक्ति आन्दोलन के जरिये मुस्लिम विद्वेष का जो गेम प्लान किया गया, उसका राजनीतिक इम्पैक्ट क्या हुआ इसे बताने की जरुरत नहीं है।


हेट -पॉलिटिक्स से भाजपाइयों के हाथ में आई सत्ता से मुसलमानों में असुरक्षा-बोध जरुर बढ़ा, किन्तु असल नुकसान दलित-आदिवासी और पिछड़ों का हुआ है। आंबेडकर प्रवॢतत जिस आरक्षण के सहारे हिन्दू आरक्षण (वर्ण-व्यवस्था) के जन्मजात वंचित शक्ति के स्रोतों में शेयर पाकर राष्ट्र के मुख्यधारा से जुड़ रहे थे, उस आरक्षण के खात्मे में ही संघ प्रशिक्षित प्रधानमंत्रियों ने अपनी अधिकतम उ$र्जा लगायी है। इस हेतु ही उन्होंने बड़ी-बड़ी सरकारी कपनियों को, जिनमे हजारों लोग जॉब पाते थे, औने-पौने दामों में बेचने जैसा देश-विरोधी काम अंजाम दिया। इस मामले में नरेंद्र मोदी, वाजपेयी को भी बौना बना दिए। वही मोदी पीएम के रूप में अपने पहले कार्यकाल में सरकारी अस्पतालों, हवाई अड्डों, रेलवे इत्यादि को निजी हाथों में देने में सर्वशक्ति लगाने के बाद दुबारा सत्ता में आकर आज बड़ी-बड़ी कंपनियों को बेचने में अधिकतम उ$र्जा लगा रहे हैं। उनके इस काम को संघ के ही स्वदेशी जागरण मंच ने गत दिसंबर में एक प्रस्ताव पारित कर देश-विरोधी काम घोषित कर दिया है। यह सब काम वह सिर्फ वर्ग-शत्रु बहुजनों को फिनिश करने के लिए ही कर रहे हैं। उनकी नीतियों से पिछले साढ़े पांच सालों में बहुजन उन स्थितियों में पहुँच गए हैं, जिन स्थितियों में दुनिया के तमाम वंचितों ने स्वाधीनता संग्राम की लड़ाई छेड़ा। मोदी -राज में एक ओर जहाँ दलित-आदिवासी और पिछड़े गुलाम बनते जा रहे हैं, वहीं हिन्दू आरक्षण के अल्पजन सुविधाभोगी वर्ग का शक्ति के समस्त स्रोतों(आॢथक-राजनीतिक-शैक्षिक-धार्मिक) पर औसतम 80-90 प्रतिशत कब्$जा हो गया है।


शक्ति के स्रोतों पर सुविधाभोगी वर्ग के अभूतपूर्व कब्जे से वंचित बहुजन जिस पैमाने पर सापेक्षिक वंचना(रिलेटिव डिप्राइवेशन ) के शिकार हुए हैं, उसका भाजपा-विरोधी यदि कायदे से अहसास करा दें तो मुस्लिम विद्वेष के जरिये भाजपा के हेट -पॉलिटिक्स की सारी चाल बिखर कर रह जाएगी। क्योंकि तब बहुसंख्य लोगों की नफरत विशेषाधिकारयुक्त  सुविधाभोगी वर्ग की ओर शिफ्ट हो जाएगी। याद रहे भाजपा की हेट पॉलिटिक्स इसलिए कामयाब हो जाती है क्योंकि इसके झांसे में निरीह दलित, आदिवासी और पिछड़े आ जाते हैं।