राजनीतिक संरक्षण में पहले भी कई ऐसे विकास हुए जिनके दम पर दलों के कई नेताओं का हुआ विकास 

पहले भी कई ढेर  हुए  “विकास”


राजनीतिक संरक्षण में पहले भी कई ऐसे विकास हुए जिनके दम पर दलों के कई नेताओं का हुआ विकास 


कल्याण सिंह की सुपारी लेने के बाद ढेर हुआ था श्रीप्रकाश शुक्ला


1991 के विस चुनाव में भाजपा ने दस्यु तहसीलदार को लड़ाया था मुलायम के खिलाफ चुनाव, काम-तमाम

 

चंबल के दुर्दात दस्यु ददुआ और निर्भय गूजर के फरमान से तय होते थे कई दलों के उम्मीदवार ,हुआ ढेर

 

मथुरा के रामवृक्ष यादव को था सपा के कई दिग्गज नेताओं को संरक्षण,काम-तमाम

 

10 जुलाई: विकास दुबे एनकाउंटर में मारा गया

 

त्रिनाथ कुमार शर्मा



लखनऊ। कानपुर के बिकरू गांव में सीओ सहित आठ पुलिस वालों की हत्या करने वाले पांच लाख का इनामी विकास दुबे एनकाउंटर में ढेर हो गया है। एसटीएफ गाड़ी उसे कानपुर ला रही थी। इस दौरान गाड़ी पलट गई। उसने हथियार छीनकर भागने की कोशिश की। जिसके बाद पुलिस ने उसे मुठभेड़ में मार गिराया है। कल ही विकास दुबे उज्जैन के महाकाल मंदिर परिसर से गिरफ्तार किया गया था। वारदात के बाद से फरार विकास यूपी, दिल्ली, हरियाणा और मध्य प्रदेश पुलिस को चकमा देकर दर्शन करने मंदिर पहुंचा था। गिरफ्तारी के बाद विकास से पुलिस ट्रेनिंग सेंटर में दो घंटे से ज्यादा पूछताछ की गई। इसके बाद उसे मध्यप्रदेश पुलिस ने यूपी एसटीएफ को सौंप दिया था। 


कानपुर के चौबेपुर थाना इलाके का बिकरू गांव... 2 जुलाई की रात गैंगस्टर विकास दुबे की गैंग ने 8 पुलिसवालों को गोलियों से भून दिया था। अगली सुबह से ही यूपी पुलिस विकास गैंग के सफाए में जुट गई। सरगना विकास 3 राज्यों की पुलिस को चकमा देकर यूपी से हरियाणा और फिर राजस्थान होते हुए मध्यप्रदेश पहुंच गया। सरेंडर के अंदाज में उज्जैन के महाकाल मंदिर से गुरुवार को विकास की गिरफ्तारी हुई। यूपी पुलिस उसे कानपुर ले जा रही थी, लेकिन रास्ते में विकास का वही अंजाम हुआ जिसके डर से वह भागता फिर रहा था। शुक्रवार सुबह कानपुर से 17 किमी पहले पुलिस ने विकास का विनाश कर दिया, उसे एनकाउंटर में मार गिराया। एनकाउंटर से बचने के लिए विकास खुद गिरफ्तार होने पहुंचा था, लेकिन 24 घंटे भी नहीं बच पाया। विकास की गिरफ्तारी गुरुवार सुबह 9.30 बजे हुई, शुक्रवार सुबह 6.30 बजे उसका एनकाउंटर हो गया।



 4 एनकाउंटर में लगभग एक जैसी थ्योरी



बिकरू शूटआउट केस में 3 दिन में चौथा और 8 दिन में छठा एनकाउंटर हुआ है। विकास से पहले गुरुवार को उसके करीबी प्रभात झा का कानपुर में और बऊआ दुबे का इटावा में एनकाउंटर हुआ था। इससे एक दिन पहले यानी बुधवार को विकास का राइट हैंड और शार्प शूटर अमर दुबे हमीरपुर में मारा गया। चारों के एनकाउंटर में लगभग एक जैसी थ्योरी सामने आई कि वे पुलिस पर हमला कर भागने की कोशिश कर रहे थे। इससे पहले विकास के मामा प्रेमप्रकाश पांडे और सहयोगी अतुल दुबे का 3 जुलाई को ही एनकाउंटर हो गया था।


कानपुर शूटआउट केस में अब तक क्या हुआ?



2 जुलाई:
 विकास दुबे को गिरफ्तार करने 3 थानों की पुलिस ने बिकरू गांव में दबिश दी, विकास की गैंग ने 8 पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी।
3 जुलाई: पुलिस ने सुबह 7 बजे विकास के मामा प्रेमप्रकाश पांडे और सहयोगी अतुल दुबे का एनकाउंटर कर दिया। 20-22 नामजद समेत 60 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई।
5 जुलाई: पुलिस ने विकास के नौकर और खास सहयोगी दयाशंकर उर्फ कल्लू अग्निहोत्री को घेर लिया। पुलिस की गोली लगने से दयाशंकर जख्मी हो गया। उसने खुलासा किया कि विकास ने पहले से प्लानिंग कर पुलिसकर्मियों पर हमला किया था।
6 जुलाई: पुलिस ने अमर की मां क्षमा दुबे और दयाशंकर की पत्नी रेखा समेत 3 को गिरफ्तार किया। शूटआउट की घटना के वक्त पुलिस ने बदमाशों से बचने के लिए क्षमा दुबे का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन क्षमा ने मदद करने की बजाय बदमाशों को पुलिस की लोकेशन बता दी। रेखा भी बदमाशों की मदद कर रही थी।
8 जुलाई: एसटीएफ ने विकास के करीबी अमर दुबे को मार गिराया। प्रभात मिश्रा समेत 10 बदमाशों को गिरफ्तार कर लिया।
9 जुलाई: मुख्य आरोपी गैंगस्टर विकास दुबे उज्जैन से गिरफ्तार। प्रभात मिश्रा और बऊआ दुबे एनकाउंटर में मारे गए।
10 जुलाई: विकास दुबे एनकाउंटर में मारा गया।



सनद रहे कि राजनीतिक संरक्षण में पहले भी कई ऐसे विकास हुए जिनके दम पर राजनीतिक दलों के कई दिग्गज और स्थापित नेताओं का विकास हुआ। इन विकास में कई तो चंबल के बीहड़ से थे तो कई अंडरवर्ल्ड में स्थापित थे। मनबढ़ इन माफियाओं ने जब स्वयं माननीय बनने की इच्छा जताई या फिर अपने आकाओं के चेहरों से नकाब उतारनी शुरू कर की तो उन्हे मौत के घाट उतार दिया गया।

कानपुर की घटना में दस पुलिसकर्मियों को मौत के घाट उतारने वाले विकास दुबे को जरायम की दुनिया में स्थापित करने में सूबे के सफेदपोशों की भी खासी भूमिका रही। चुनाव जीतने और जिताने से लेकर रंगदारी और वसूली में हर राजनीतिक दल के लिए विकास दुबे एक जरूरत बन गए थे। पांच साल बिकरू का प्रधान और पन्द्रह वर्ष तक जिला पंचायत सदस्य रह चुके विकास ने प्रधान की सीट आरक्षित होने के बाद अपने प्रभाव से अपने समर्थक की पत्नी को निर्विरोध प्रधान बनवाया था और स्वयं बसपा के समर्थन से जिला पंचायत सदस्य बन गया।

यही नहीं, लोगों को चुनाव में मदद करने वाले विकास दुबे मे स्वयं भी माननीय बनने की चाह हिलोर मार रही थी इसीलिए वह स्वयं भी रनिया सीट से चुनाव लडऩे की तैयारी में था। सपा-बसपा में तो उसकी खासी सक्रियता थी ही लेकिन भाजपा मे भी उसके रिश्ते बेहतर थे। शायद इसीलिए कानपुर के तत्कालीन एसएसपी ने उसके खिलाफ शिकायतों के बावजूद कार्रवाई करने मे कोई रूचि नहीं ली।

घटना के बाद उसकी जो तस्वीरे सोशलमीडिया पर वायरल हुयी उनमे उसे भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं तथा मंत्रियों के साथ देखा जा सकता है। स्वयं उसकी मां सरला देवी ने भी कहा है कि नेता नगरी ने उसके बेटे को शातिर अपराधी बना दिया है।

 

चंबल के बीहड़ों में अपनी कारगुजारियों से दहशत का साम्राज्य स्थापित करने वाले शिवकुमार ददुआ का सपा-बसपा सरीखे राजनीतिक दलों में खासा वर्चस्व था। पंचायत से लेकर पार्लियामेंंट तक के  चुनावों में उम्मीदवारों के चयन से लेकर उन्हे जितवाने तक में उसकी अहमं भूमिका हुआ करती थी। लोगों को संसद और पंचायतों में भेजने वाले ददुआ स्वयं तो किसी सदन का सदस्य नहीं बने लेकिन उन्होंने अपने भाई बालकुमार और बेटे बीर कुमार जरूर सांसद विधायक और बेटी को ब्लाक प्रमुख बनवा लिया था। अपनी अपराधिक पृष्ठभूमि के चलते उसने अपने पारिवारिक सदस्यों को स्थापित करने साथ ही सपा-बसपा जैसे राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों को जितवाने में निर्णायक भूमिका निभाई थी। 22 जुलाई 2007  को ददुआ पुलिस मुठभेड़ में मार दिया गया था।


भारतीय जनता पार्टी जो सबसे ज्यादा अनुशासित और मर्यादित होने का स्वांग करती है उसने भी अपराधियों के राजनीतिककरण करने मे कभी परहेज नहीं किया।

1991 के विधानसभा चुनाव में उसने समाजवादी जनता पार्टी के उम्मीदवार मुलायम सिंह यादव के खिलाफ चंबल के दुर्दात दस्यु सरगना तहसीलदार सिंह को अपना उम्मीदवार बनाया था। दस्युसरगना को उम्मीदवार बनाए जाने पर जब सवाल उठे तो भाजपा ने तर्क दिया कि कांटा से कांटा निकालने की टैक्टिस के चलते ही तहसीलदार सिंह को उम्मीदवार बनाया गया था। हालांकि बाद मे चुनाव में धांधली होने के बाद यह पूरी चुनाव प्रक्रिया निरस्त कर दी गयी थी। रही सही कसर भारतीय जनता पार्टी ने 1997 में  पूरी कर दी। जब भाजपा के सामने बहुमत का संकट का आया तो उसने अपनें मंत्रिमंडल में अपराधिक पृष्ठभूमि के कई लोगों को मंत्री बनाया।


समाजवादी पार्टी की तो बुनियाद ही दबंग माफिया और अपराधिक पृष्ठभूमि की ही बिना पर टिकी है। अपराधियों माफियाओं को राजनीति में महिमामंडित करने का सबक बाकी दलो ने समाजवादी पार्टी से ही सीखा। उसने दुर्दात दस्यु सरगनाओं को संसद से लेकर विधानसभा तक भेजा। यही नहीं उन्हे मंत्रिमंडल तक में शामिल किया। जो राजनीति में स्थापित नहीं हो पाये उन्होंने राजनीतिक संरक्षण में जमीने कब्जियाने के साथ ही जरायम की दुनिया में अपना सिक्का जमाया।

मथुरा के जवाहरबाग कांड के रामवृक्ष यादव ने मथुरा की 286  एकड़ भूमि पर अवैध कब्जा कर रखा था। तत्कालीन अखिलेश सरकार के कार्यकाल में ही उसने जमीन मुक्त कराने गए पुलिस पार्टी पर हमला किया जिसमे एक एएसपी और एसओं सहित कई पुलिसकर्मी मारे गए। हालांकि पुलिस ने भी कुछ ही दिन मे उसका भी काम-तमाम कर दिया। रामवृक्ष यादव को सपा के अग्रिम पंक्ति के एक शीर्षस्थ नेता का संरक्षण हासिल था।


चंबल के ही बीहड़ों में दशकों तक अपना सिक्का जमाए रहे निर्भय गूजर का सपा-बसपा सरीखे दलों में खासा दखल था। मुठभेड़ में मारे जाने से पहले उसने कई टीवी चैनलों में दिए गए साक्षात्कार में सपा-बसपा नेताओं से अपने रिश्तों का जिक्र करते हुए यहां तक कहा था कि इन दलों के पंचायत से लेकर पार्लियामेट तक के चुनावों में उम्मीदवारों को जितवाने में उसकी निर्णायक भूमिका रहती है। उसने उस समय सपा के एक बड़े नेता का नाम लेकर कहा था कि उसने उन्हे चांदी का मुकुट पहनाया था तो साथ ही यह उजागर किया था कि उस समय सपा सरकार में एक कैबिनेटमंत्री को उसने सोने की तलवार भेंट की थी। एक के बाद एक उसके द्वारा किए जा रहे खुलासों के बाद 7 नवंबर 2005 को उसका इनकांउटर कर दिया गया।


किसी समय पूर्वाचल के माफिया श्रीप्रकाश शुक्ला तो इतना मनबढ़ था कि उसने तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की हत्या की सुपारी ले ली थी। श्रीप्रकाश शुक्ल किसी समय पूर्वाचल के एक बाहुबली नेता जो बाद में भाजपा सरकार में कैबिनेट मंत्री बने का सार्पशूटर कहा जाता था। उसके नाम से शासन से लेकर सत्ता में बैठे लोगों तक की रूह कांपती थी। लेकिन सीएम कल्याण सिंह की सुपारी लेने के बाद उसकी उल्टी गिनती शुरू हो गयी और 22  सिंतंबर 1998 में उसका नोएडा में इनकांउटर कर दिया गया।